Monday, April 23, 2018

Caste System and its Reality : जाति परंपरा और इसकी वास्तविकता (Part 2)

History of Caste System in India, Historical Debate: Varna System
भारत में जाति व्यवस्था का इतिहास: ऐतिहासिक बहस: वर्ण व्यवस्था
In Indian history, 2000 years old scriptures should be considered new. As main (old) scriptures are written way before the birth of Christ.   
भारतीय इतिहास में, 2000 (मसीह के जन्म के बाद) साल पुराने ग्रंथों को नया माना जाना चाहिए है। क्योंकि अधिकांश मुख्य (पुराने) ग्रंथ मसीह के जन्म से पहले लिखे गए हैं।
Who is Brahmin in Kaliyuga? कलियुग में ब्राह्मण कौन है?
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत् द्विजः | वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः | स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को बताया गया है|
जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शुद्र, संस्कार से द्विज, वेद के पठान-पाठन से विप्र (विद्वान्) और जो ब्रह्म को जनता है वो ब्राह्मण कहलाता है| 
By birth everyone is a Shudra (illiterate), by getting Sanskar (getting teacher etc.), one becomes a dvija (take Rebirth), by study of the Vedas one becomes a vipra (Wise), and one who knows Brahman (Supreme truth/God) is a Brahmin. -Skanda Purana
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ [भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 41
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा (जन्म से नहीं) विभक्त किए गए हैं|
brāhmaṇa-kṣhatriya-viśhāṁ śhūdrāṇāṁ cha parantapa; karmāṇi pravibhaktāni svabhāva-prabhavair guṇaiḥ. (Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 41)
The duties of the Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras—are distributed according to their qualities, in accordance with their guṇas (and not by birth).
श्रीमद देवी भगवद पुराण, पृष्ठ 414, स्कन्द 6, गीता प्रैस गोरखपुर 
राजन! उन प्राचीन युगों में जो राक्षस समझे जाते थे, वे कलि (कलयुग) में ब्राह्मण माने जाते हैं, क्योंकि अब के ब्राह्मण प्राय: पाखंड करने में तत्पर रहते हैं। दूसरों को ठगना, झूठ बोलना और वैदिक धर्म-कर्मों से अलग रहना --- कलियुगी ब्राह्मणों का स्वाभाविक गुण बन गया है।
कृपया याद रखें, संस्कृत में एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं शब्द का अर्थ उनके संदर्भ पर निर्भर करता है|
In kaliyug, Most Brahmin will behave like Demons of previous yugas. They will lie, will not follow Dharma and deceive people. -Devi-Bhagavata Purana 
Please Remember, In Sanskrit one word can have multiple meanings. Meaning of the word depends on its context.
Meaning of Dvija, द्विज का अर्थ 
Dvija (Sanskrit: द्विज) means "twice-born". The concept is premised on the belief that a person is first born physically and at a later date is born for a second time spiritually, usually when he undergoes the rite of passage that initiates him into a school for Vedic studies. 
The word Dvija, and its equivalent such as Dvijati, is neither found in any Vedas, any Upanishad, nor in any Vedanga literature such as the Vyakarana, Shiksha, Nirukta, Chandas, Shrauta-sutras or Grihya-sutras. The term is missing in all theological and rituals-related text preceding the 2nd-century BCE, as well as the earliest Dharmasutras texts. 
Please Remember, In Sanskrit one word can have multiple meanings. Meaning of the word depends on its context.
द्विज शब्द 'द्वि' और 'ज' से बना है। द्वि का अर्थ होता है दो और ज (जायते) का अर्थ होता है जन्म होना अर्थात् जिसका दो बार जन्म हो उसे द्विज कहते हैं। द्विज शब्द का प्रयोग हर उस मानव के लिये किया जाता है जो एक बार पशु के रुपमे माता के गर्भ से जन्म लेते है और फिर बड़ा होने के वाद अच्छी संस्कार से मानव कल्याण हेतु कार्य करने का संकल्प लेता है। द्विज शब्द का प्रयोग किसी एक प्रजाती या केवल कोइ जाती विशेष के लिये नहि किया जाता हैं। मानव जब पैदा होता है तो वो केवल पशु समान होता है परन्तु जब वह संस्कारवान और ज्ञानी होता है तव ही उसका जन्म दुवारा अर्थात असली रुपमे होता है।
शब्द “द्विज” किसी भी वेद, किसी उपनिषद में नहीं हैं, न ही किसी भी वेदांगा साहित्य जैसे कि व्यंजन, शिक्षा, निरुक्तता, चन्द, श्रुत-सूत्र या गृहय-सूत्र में पाया जाता है। यह शब्द 2 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से पहले के सभी धार्मिक और अनुष्ठान से संबंधित पाठ में नहीं है। कृपया याद रखें, संस्कृत में एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं शब्द का अर्थ उनके संदर्भ पर निर्भर करता है|
History of Caste System in India, Historical Debate ,  भारत में जाति व्यवस्था का इतिहास : ऐतिहासिक बहस
The caste system in India is the paradigmatic ethnographic example of caste. It has origins in ancient India, and was transformed by various ruling elites in medieval, early-modern, and modern India, especially the Mughal Empire and the British Raj. It consists of two different concepts, varna (theoretical classification based on occupation) and jati (Jāti (community) refers to the thousands of endogamous groups prevalent across the subcontinent), which may be regarded as different levels of analysis of this system.
भारत की जाति व्यवस्था नृवंशविज्ञान का एक उदाहरण है|इसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी||इस में मध्ययुगीन,और आधुनिक भारत के विभिन्न शासक अभिजात वर्गों द्वारा परिवर्तन किया गया था (खासकर मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश राज।)
इसमें दो अलग-अलग अवधारणाएं शामिल हैं , वर्ण (व्यवसाय पर आधारित सैद्धांतिक वर्गीकरण) और जाति (उपमहाद्वीप में प्रचलित हजारों अंतर्विवाही समूहों को संदर्भित करता है) |एक जाति को एक गोत्र ​​के आधार पर विजातीय विवाह करने समूहों में विभाजित किया जा सकता है।

The caste system as it exists today is thought to be the result of developments during the collapse of the Mughal era and the British colonial regime in India.
de Zwart, Frank (July 2000), "The Logic of Affirmative Action: Caste, Class and Quotas in India.
Bayly, Susan (2001), Caste, Society and Politics in India from the Eighteenth Century to the Modern Age.
The collapse of the Mughal era saw the rise of powerful men who associated themselves with kings, priests and ascetics, affirming the regal and martial form of the caste ideal, and it also reshaped many apparently casteless social groups into differentiated caste communities.
Bayly, Caste, Society and Politics (2001), pp. 26–27
जाति व्यवस्था का आधुनिक रुप , मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के पतन के साथ उत्पन्न हुआ था|मुगल साम्राज्य के पतन के फलस्वरुप एक (उत्पन्न सत्ता शून्य मे) ऎसे वर्ग का उदय हुआ जो सत्ता के निकट था. इस वर्ग ने जाति को पुर्ण रूप मे स्थापित किया|जाति व्यवस्था का आधुनिक रुप , मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के पतन के साथ उत्पन्न हुआ था| मुगल साम्राज्य के पतन के फलस्वरुप एक (उत्पन्न सत्ता शून्य मे) ऎसे वर्ग का उदय हुआ जो सत्ता के निकट था. इस वर्ग ने जाति को पुर्ण रूप मे स्थापित किया|
British Raj furthered this development, making rigid caste organisation a central mechanism of administration.
Bayly, Caste, Society and Politics (2001)
Between 1860 and 1920, the British segregated Indians by caste, granting administrative jobs and senior appointments only to the upper castes. Social unrest during the 1920s led to a change in this policy. From then on, the colonial administration began a policy of positive discrimination by reserving a certain percentage of government jobs for the lower castes.
Burguière & Grew (2001), pp. 215–229
Caste-based differences have also been practised in other regions and religions in the Indian subcontinent like Nepalese Buddhism, Christianity, Islam, Judaism and Sikhism. It has been challenged by many reformist Hindu movements, Islam, Sikhism, Christianity, and also by present-day Indian Buddhism. https://en.wikipedia.org/wiki/Caste_system_in_India
ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने इस जाति व्यवस्था को प्रशासन मे जगह देकर और पक्का कर दीया |ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने १८६०-१९२० के दौरान जाति के अनुसार नौकरियाँ दी. ऊँचे पदों पर उच्च जाति वालों  को ही नौकरी दी जाती थी|१९२० के दौरान हुए सामाजिक आंदोलनों के कारण, ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने इस व्यवस्था में बदलाव कीये और छोटि जातियों को आरक्षण दीया |जाति आधारित भेदभाव पूरे भारतीय उपमहाव्दीप (नेपाली बुद्धिस्म, ईसाई, इस्लाम, यहूदी और सिख धर्म) के हर धर्म में होत था|
Varna is a Sanskrit term varṇa (वर्णः). It is derived from the root vṛ, meaning "to cover, to envelop, count, classify consider, describe or choose" (compare vṛtra).
The word appears in the Rigveda, where it means "colour, outward appearance, exterior, form, figure or shape". The word means "color, tint, dye or pigment" in the Mahabharata. Varna contextually means "colour, race, tribe, species, kind, sort, nature, character, quality, property" of an object or people in some Vedic and medieval texts. Varna refers to four social classes in the Manusmriti.
वर्ण का मूल शब्द व्र है. इसका उपयोग  “गिनने, वर्गीकृत करने, वर्णन करने या चुनने के लिए” होता है|यह शब्द ऋग्वेद में प्रकट होता है, जहां इसका मतलब है “रंग, बाहरी रूप, आकृति या आकार”|महाभारत में इस शब्द का मतलब है "रंग या डाई”| कुछ वैदिक और मध्ययुगीन ग्रंथों में वर्ग शब्द का (प्रासंगिक रूप में) मतलब है "रंग, जाति, जनजाति, प्रजातियां, दयालु, प्रकार, प्रकृति, चरित्र, गुणवत्ता, संपत्ति“ वर्ग शब्द, मनुस्मृति में चार सामाजिक वर्गों को दर्शाता है।
The earliest application to the formal division into four social classes (without using the term varna) appears in the late Rigvedic Purusha Sukta, which has the Brahman, Rajanya (instead of Kshatriya), Vaishya and Shudra classes forming the mouth, arms, thighs and feet at the sacrifice of the primordial Purusha, respectively. A good deal of the language is still obscure and many hymns as a consequence are unintelligible.
https://en.wikipedia.org/wiki/Rigveda
https://en.wikipedia.org/wiki/Purusha_Sukta
चार सामाजिक वर्गों (वर्ण शब्द के उपयोग के बिना) औपचारिक विभाजन का सबसे पुराना वर्णन उत्तर ऋग्वेदिक काल के पुरुष सुक्त में दिखाई देता है| आद्य पुरुष के बलिदान के फलस्वरुप ब्राह्मण, राजान्या (क्षत्रिय के बजाय), वैश्य और शुद्र क्रमशः मुंह, बाहों, जांघों और पैरों उत्पन्न से होते हैं।ऋग्वेद सनातन धर्म का सबसे आरंभिक स्रोत है।ॠग्वेद में कुल दस मण्डल हैं और उनमें १०२८ सूक्त हैं और कुल १०,५८० ॠचाएँ हैं।
इसका कुछ हिस्सा अभी भी अस्पष्ट है और नतीजतन कुछ ॠचाएँ अस्पष्ट है|
Purusha sukta (puruṣasūkta) is hymn 10.90 of the Rigveda, dedicated to the Purusha, the "Cosmic Being". Many 19th and early 20th century western scholars suggest that it was interpolated in post-Vedic era, and has a relatively modern origin. It means it may be added later. Stephanie Jamison and Joel Brereton, a professor of Sanskrit and Religious studies, state, "there is no evidence in the Rigveda for an elaborate, much-subdivided and overarching caste system", and "the varna system seems to be embryonic in the Rigveda and, both then and later, a social ideal rather than a social reality". This is the only hymn which talks about varna. (One hymn in 1028 hymns)
पुरुषसूक्त ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह (10.90) है|वेदों (और सांख्य शास्त्र में) में पुरुष शब्द का अर्थ जीवात्मा तथा परमात्मा आया है, पुरुष लिंग के लिए पुमान और पुंस जैसे मूलों का इस्तेमाल होता है।19वीं और 20 वीं शताब्दी के पश्चिमी विद्वानों का सुझाव है कि इसे वैदिक युग के बाद में जोड़ा गया  था, और इसकी अपेक्षाकृत आधुनिक उत्पत्ति है। संस्कृत और धार्मिक अध्ययन के प्रोफेसरों ने कहा, "एक विस्तृत, अति-विभाजित और परिपक्व जाति व्यवस्था के कोई सबूत ऋग्वेद में नहीं है" और "वर्ण प्रणाली ऋग्वेद में भ्रूण अवस्था मे प्रतीत होती है और उस समय और उसके बाद के समय में , यह सामाजिक हकीकत के बजाय सामाजिक आदर्श था।यह एकमात्र सूक्त है जो वर्ण के बारे में बात करता है। (1028 सूक्त में एक सूक्त)

Varna system is extensively discussed in Dharma-sastras. Recent scholarship suggests that the discussion of varna as well as untouchable outcastes, in these texts does not resemble the modern era caste system in India. Patrick Olivelle, a professor of Sanskrit and Indian Religions and credited with modern translations of Vedic literature, Dharma-sutras and Dharma-sastras, states that ancient and medieval Indian texts do not support the ritual pollution, purity-impurity as the basis for varna system. Olivelle adds that the overwhelming focus in matters relating to purity/impurity in the Dharma-sastra texts concerns "individuals irrespective of their varna affiliation" and all four varnas could attain purity or impurity by the content of their character, ethical intent, actions, innocence or ignorance, stipulations, and ritualistic behaviours.
Olivelle, Patrick (2008). Chapter 9. Caste and Purity in Collected essays. Firenze, Italy: Firenze University Press. pp. 240–241.
धर्मशास्त्र में वर्ण व्यवस्था पर व्यापक चर्चा की गई है।हाल के शोध से पता चलता है कि इन ग्रंथों में जो वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यों की चर्चा है, वह भारत की आधुनिक युग जाति व्यवस्था के समान नहीं है।पैट्रिक ओलिवेल एक भारतविद हैं। वे एक भाषाविद और संस्कृत साहित्य के विद्वान हैं जिनका कार्य तप, त्याग और धर्म पर केंद्रित है। ओलिवेल, टेक्सास विश्वविद्यालय, आॅस्टिन में एशियाई अध्ययन विभाग में भारतीय धर्म और संस्कृत के प्रोफेसर हैं।वह कहते हैं कि प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय ग्रंथ कर्मकांडी प्रदूषण, शुद्धता-अशुद्धता का समर्थन वर्ण व्यवस्था के आधार पर नहीं करते हैं।

According to Olivelle, purity-impurity is discussed in the Dharma-sastra texts, but only in the context of the individual's moral, ritual and biological pollution (eating certain kinds of food such as meat, urination and defecation). In his review of Dharma-sastras, Olivelle writes, "we see no instance when a term of pure/impure is used with reference to a group of individuals or a varna or caste". The only mention of impurity in the Shastra texts from the 1st millennium is about people who commit grievous sins and thereby fall out of their varna. These, writes Olivelle, are called "fallen people" and impure, declaring that they be ostracised.
Olivelle, Patrick (2008). Chapter 9. Caste and Purity in Collected essays. Firenze, Italy: Firenze University. 
Olivelle, Patrick (1998). "Caste and Purity: A Study in the Language of the Dharma Literature". Contribution to Indian Sociology. 
ओलिवेल कहते हैं कि धर्म-शास्त्र ग्रंथों में शुद्धता / अशुद्धता से संबंधित मामलों में जबरदस्त फोकस व्यक्तियों की शुद्धता / अशुद्धता पर हैं न उनके वर्ण पर|ओलिवेल कहते हैं कि धर्म-शास्त्र ग्रंथों में शुद्धता / अशुद्धता से संबंधित मामलों में जबरदस्त फोकस व्यक्तियों की शुद्धता / अशुद्धता पर हैं न उनके वर्ण पर और सभी चार वर्ण अपने चरित्र, नैतिक इरादे, कार्यों, अज्ञानता, शर्तों, और अनुष्ठान व्यवहार के आधार पर शुद्धता या अशुद्धता प्राप्त कर सकते हैं|वह लिखते हैं, "हमें कोई उदाहरण नहीं दिखता है जब शुद्धता / अशुद्धता की चर्चा व्यक्तियों के समूह या वर्ण या जाति के संदर्भ में की जाती है"।पहली सहस्राब्दी से शास्त्र ग्रंथों में अशुद्धता का एकमात्र उल्लेख उन लोगों के बारे में है जो गंभीर पाप करते हैं और इस तरह वे वर्ण व्यवस्था से बहिष्कृत कर दीयॆ जाते हैं तथा इन्हॆं पतित माना जात था|

The first three varnas are described in the some Dharmasastras as "twice born" and they are allowed to study the Vedas. Such a restriction of who can study Vedas is not found in the Vedic era literature.
Manusmriti assigns cattle rearing as Vaishya occupation but historical evidence shows that Brahmins, Kshatriyas and Shudras also owned and reared cattle and that cattle-wealth was mainstay of their households. Ramnarayan Rawat, a professor of History and specialising in social exclusion in the Indian subcontinent, states that 19th century British records show that Chamars, listed as untouchables, also owned land and cattle and were active agriculturalists. The emperors of Kosala and the prince of Kasi are other examples.
Kumar, Arun (2002). Encyclopaedia of Teaching of Agriculture. Anmol Publications. p. 411.
Rawat, Ramnarayan (2011). Reconsidering untouchability : Chamars and Dalit history in North India. Bloomington: Indiana University Press.
हले तीन वर्णों को कुछ धर्मशास्त्रों में "दो बार पैदा हुए (द्विज)" के रूप में वर्णित किया गया है और उन्हें वेदों का अध्ययन करने की अनुमति थी | हालांकि, वेदों का अध्ययन करने से संबंधित प्रतिबंध वैदिक युग के साहित्य में नहीं पाए जाते हैं। मनुस्मृति, वैश्य व्यवसाय के रूप में मवेशी पालन को मानता है लेकिन ऐतिहासिक सबूत बताते हैं कि ब्राह्मणों, क्षत्रिय और शुद्रों के पास भी मवेशियों का स्वामित्व था और उन्होनें ने मवेशी पालन भी किया था| मवेशी धन उनके घरों का मुख्य आधार था। 

भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक बहिष्कार के इतिहास में विशेषज्ञता रखने वाले प्रोफेसर राम नारायण रावत कहते हैं कि 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश रिकॉर्ड बताते हैं कि अस्पृश्यों के रूप में सूचीबद्ध चमारों के पास भूमि और मवेशी भी थे और वे सक्रिय कृषिविद थे।कोसाल के सम्राट और काशी के राजकुमार अन्य उदाहरण हैं।

The Mahabharata, estimated to have been completed by about the 4th century CE, discusses the Varna system in section 12.181.
The Epic offers two models on Varna. The first model describes Varna as colour-coded system, through a sage named Bhrigu, "Brahmins Varna was white, Kshtriyas was red, Vaishyas was yellow, and the Shudras' black". This description is questioned by another prominent sage Bharadvaja who says that colours are seen among all the Varnas, that desire, anger, fear, greed, grief, anxiety, hunger and toil prevails over all human beings, that bile and blood flow from all human bodies, so what distinguishes the Varnas, he asks? The Mahabharata then declares, according to Alf Hiltebeitel, a professor of religion, "There is no distinction of Varnas. This whole universe is Brahman. It was created formerly by Brahma, came to be classified by acts.“
Hiltebeitel, Alf (2011). Dharma : its early history in law, religion, and narrative. Oxford University Press. pp. 529–531.


महाभारत का चौथी शताब्दी सीई तक पूरा होने का अनुमान है। यह 12.181 में वर्ण व्यवस्था पर चर्चा करता है। महाभारत वर्ण व्यवस्था पर दो मॉडल पेश करता है। पहला मॉडल वर्ण व्यवस्था को रंग के आधार पर वर्णित करता है, भृगु नाम के ऋषि कहते हैं "ब्राह्मण सफेद थे, क्षत्रिय लाल थे, वैश्य पीले थे, और शूद्र काले थे|”इस वर्णन को एक अन्य प्रमुख ऋषि भारद्वाज ने चुनौती दी है वह पूछ्ते हैं कि वासना क्रोध, भय, लालच, दुःख, चिंता, भूख और परिश्रम वैयक्तिक पर निर्भर करता है तथा सभी मानवों में पित्त और रक्त प्रवाह होता है, तथा यह रंग सभी वर्ण में देखे जाते हैं; इसलिए वर्णों में क्या अंतर है? महाभारत में तब घोषणा की जाती है, " वर्णों में कोई भेद नहीं है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म है। इसे ब्रह्मा द्वारा बनाया गया था, इसे कृत्यों द्वारा वर्गीकृत किया गया था ।" 

Ancient Buddhist texts mention Varna system in South Asia, but the details suggest that it was a non-rigid, flexible and with characteristics devoid of features of a social stratification system. Maurice Walshe, a German scholar and translator of Digha Nikaya, provides a discussion between Gotama Buddha and a Hindu Brahmin named Sonadanda who was very learned in the Vedas. Peter Masefield, a Buddhism scholar and ancient Pali texts translator, states that during the Nikāya texts period of Buddhism (3rd century BC to 5th century AD), Varna as a class system is attested, but the described Varna was not a caste system. 
Masefield, Peter (2008). Divine revelation in Pali Buddhism. Routledge. pp. 146–154.
Walshe, Maurice (1995). The long discourses of the Buddha : a translation of the Dīgha Nikāya. Boston: Wisdom Publications.


प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में दक्षिण एशिया की वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, लेकिन विवरण बताते हैं कि यह एक लचीला सामाजिक वर्गीकरण व्यवस्था थी ।मॉरीस वाल्श, एक जर्मन विद्वान और दीर्घनिकाय के अनुवादक  गौतम बुद्ध और एक हिंदू ब्राह्मण के बीच चर्चा का विवरण बताते हैं| एक बौद्ध धर्म विद्वान और प्राचीन पाली ग्रंथ अनुवादक पीटर मासफील्ड बताते हैं की निकाय (सुत्तपिटक बौद्ध ग्रंथों) में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख सामाजिक वर्गीकरण व्यवस्था के रूप में है, लेकिन जाति व्यवस्था के रूप में नहीं है ।
Masefield notes that people in any Varna could in principle perform any profession. The early Buddhist texts, for instance, identify some Brahmins to be farmers and in other professions. The text state that anyone, of any birth, could perform the priestly function, and that the Brahmin took food from anyone, suggesting that strictures of commensality were as yet unknown. The Tantric movement that developed as a tradition distinct from orthodox Hinduism between the 8th and 11th centuries CE also relaxed many societal strictures regarding class and community distinction. However it would be an over generalisation to say that the Tantrics did away with all social restrictions The Nikaya texts also imply that endogamy was not mandated in ancient India. 
पीटर मासफील्ड बताते हैं कि किसी भी वर्ण के लोग किसी पेशे में सैद्धांतिक रूप से काम कर सकते थे| उदाहरण के लिए प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथ बताते हैं कुछ ब्राह्मणों ने किसानों और अन्य व्यवसायों में काम किया। शास्त्रों में कहा गया है कि कोई भी पुजारी कार्य कर सकता था , और ब्राह्मण किसी से भी भोजन दान में ले लेते थे| तन्त्र, परम्परा से जुड़े हुए आगम ग्रन्थ हैं। 8 वीं और 11 वीं शताब्दी सीई के बीच रूढ़िवादी हिंदू धर्म से अलग परंपरा के रूप में विकसित तांत्रिक आंदोलन ने सामुदायिक भेदभाव के संबंध में सामाजिक कठोरता को भी कम किया।



Ādi purāṇa, an 8th-century text of Jainism by Jinasena, is the earliest mention of Varna and Jati in Jainism literature. Jinasena does not trace the origin of Varna system to Rigveda or to Purusha Sukta, instead traces varna to the Bharata legend. According to this legend, Bharata performed an "ahimsa-test" (test of non-violence), and those members of his community who refused to harm or hurt any living being were called as the priestly varna in ancient India, and Bharata called them dvija, twice born. Jinasena states that those who are committed to ahimsa are deva-Brāhmaṇas, divine Brahmins. Sikh text mention Varna as Varan, and Jati as Zat or Zat-biradari. Eleanor Nesbitt, a professor of Religion and specialising in Christian, Hindu and Sikh studies, states that the Varan is described as a class system in 18th- to 20th-century Sikh literature, while Zat developed into caste system particularly during the British colonial era.
Nesbitt, Eleanor (2005). Sikhism a very short introduction. Oxford New York: Oxford University Press. 
Jaini, Padmanabh (1998). The Jaina path of purification. Motilal Banarsidass. 
आदिपुराण जैनधर्म का एक प्रख्यात पुराण है जो सातवीं शताब्दी में जिनसेन आचार्य द्वारा लिखा गया था।आदिपुराण (जैन धर्म साहित्य में)में वर्ण और जाति का सबसे पुराना उल्लेख है|जिनसेन वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को ऋग्वेद या पुरुष सुक्त से नहीं बताते हैं, बल्कि राजा भरत की कथा के रूप में के वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को बताते हैं|इस पौराणिक कथा के अनुसार, भरत ने "अहिंसा परीक्षण" किया, और उनके समुदाय के जिन सदस्यों ने किसी भी जीवित व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या चोट पहुंचाने से इंकार कर दिया, उन्हें प्राचीन भारत में पुजारी वर्ण कहा जाता था, और भरत उन्हें द्विज (दो बार पैदा हुआ) बताते हैं ।जिनसेन आचार्य का कहना है कि जो लोग अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध हैं वे देव-ब्राह्मण, दैवीय ब्राह्मण हैं।

Something for Tantric traditions: 
https://archive.is/20130704050630/www.khapre.org/portal/url/hi/shastra/tantra/rudra/preface/z110328055441(संक्षिप्त.विवरण.तन्त्र).aspx#selection-771.0-931.109 Must watch site
ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय संस्कृति का विचार करने पर प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही वैदिक तथा तान्त्रिक -साधन -धाराओं में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है ; यह बात जैसे सत्य है , वैसे ही यह बी सत्य है कि दोनों में अंशतः वैलक्षण्य भी है । अति प्राचीन काल से ही शिष्ट जनों द्वारा तन्त्रों के समादार के असंख्य प्रमाण उपलब्ध है । ऐसी प्रसिद्धि है कि बहुसंख्यक देवता भी तान्त्रिक साधना के द्वारा सिद्धि -लाभ करते थे । तान्त्रिक साधना का परम आदर्श था -शाक्त -साधना , जिसका लक्ष्य था - महाशक्ति जगदम्बा की मातृरुप में उपासना अथवा शिवोपासना । ब्रह्मा , विष्णु , इन्द्र , चन्द्र , स्कन्द , वीरभद्र , लक्ष्मीश्वर , महाकाल , काम या मन्मथ ये सभी श्रीमाता के उपासक थे । प्रसिद्ध ऋषियों में कोई -कोई तान्त्रिक मार्ग के उपासक थे , और कोई -कोई तान्त्रिक उपासना के प्रवर्तक भी थे । ब्रह्मयामल में बहुसंख्यक ऋषियों का नामोल्लेख है , हो शिव -ज्ञान के प्रवर्तक थे ; उनमें उशना , बृहस्पति , दधीचि , सनत्कुमार , नमुलीश आदि उल्लेख्य हैं । जयद्रथयामल के मंगलाष्टक प्रकरण में तन्त्र प्रवर्तक बहुत से ऋषियों के नाम हैं , जैसे दुर्वासा , सनक , विष्णु , कस्प्य , संवर्त , विश्वामित्र , गालव , गौतम , याज्ञवल्क्य , शातातप , आपस्तम्ब , कात्यायन , भृगु आदि ।
१ . क्रोधभट्टारक ‘दुर्वासा ’
सबसे पहले दुर्वासा का नाम उल्लेखनीय है । तान्त्रिक साहित्य में ‘क्रोध भट्टारक ’ नाम से इनका परिचय मिलता हैं । प्रसिद्धि के अनुसार इन्होंने श्रीकृष्ण को ६४ अद्वैतागमों को पढाया था । यह भी किंवदन्ती है कि कलियुग में दुर्वासा द्वारा ही आगम प्रकाश में लाय गये । नेपाल दरबार के ग्रन्थागार में सुरक्षित महिम्नः स्तोत्र की एक पोथी में इनके सम्बन्ध में लिखा है - ‘सर्वासामुपनिषदां दुर्वासा जयति देशिकाः प्रथमः ’ । जयद्रथयामल नामक आगम है अनुसार भी तन्त्र के प्रवर्तक ऋषियों में दुर्वासा का नाम ब्रह्मयामलानुसारी सभी तन्त्रों के भीतर दुर्वासा -मत प्रथम है । यह बात दरबार ग्रन्थागार में उपलब्ध पिंगलागम में पिंगला -मत के प्रसंग में उल्लिखित है । अर्धचन्द्रकला विद्याओं के भीतर भी दुर्वासा का मत उल्लेखनीय है । चन्द्रकला (श्री ) विद्याएँ कौल तथा सोम (कापालिक ) मतों की संमिश्रम हैं । प्राचीन काल में इन विद्याओं में चारों वर्णो का अधिकार था , किन्तु विशेष यह था त्रैवार्णिक लो दक्षिण -मार्ग से अनुष्ठान करते थे और अन्य लोग वाम -मार्ग से ।
दुर्वासा श्रीमाता के उपासक थे । श्रीमाता के द्वादशविध उपासकों में उनका भी एक नाम है । सुनने में आता है उनकी उपास्य षडक्षरी विद्या थी । किसी -किसी के मत में ये त्रयोदशाक्षरी विद्या के उपासक थे । सौन्दर्य -लहरी की टीका में कैवल्याश्रम ने इस विद्या का कादि मत के अनुसार उद्धार भी किया है । इतने बाद भी दुर्वासा का सम्प्रदाय इस समय लुप्तप्राय ही है ।
निम्नलिखित ग्रन्थों में दुर्वासा की चर्चा है ---
१ . त्रिपुर -सुन्दरी (देवी ) - महिम्नःस्तोत्र -टीका में नित्यानन्द नाथ ने कहा है -
सकलागमाचार्यचक्रवती साक्षात्  शिव एव अनसूयागर्भसस्भूतः क्रोधभट्टारका -ख्यो दुर्वासा महामुनिः ।
२ . ललितास्तव -रत्न ।
३ . परशिव -महिम्नः स्तोत्र अथवा परशम्भु -स्तुति।
इस प्रकार दुर्वासा श्रीविद्या तथा परमशिव के उपासक थे । कालीसुधानिधि ग्रन्थ से यह पता चलता है कि ये काली के भी उपासक थे ।
२ . अगस्त्य ऋषि
प्रसंगवश इस समय अगस्त्य के सम्बन्ध में कुछ कहा जा रहा है । यह वैदिक ऋषि थे । इनके सम्बन्ध में पाञ्चरात्र तथा शाक्तागमों में भी चर्चा है । इन प्रसिद्ध ऋषि का विवरण पुराण , रामायण महाभारतादि प्रायः सभी प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है । विदर्भराज की कन्या लोपामुद्रा उनकी धर्मपत्नी थीं । उनकी चर्चा भी प्रायः सर्वत्र देखी जाती है , यह भी अगस्त्य के सदृश ही वैदिक ऋषि थीं । रामायण के अरण्यकाण्ड में सुतीक्ष्ण मुनि ने भगवान्  को गोदावरी तट -स्थित अगस्त्याश्रम का मार्ग दिखाया था । अगस्त्य ने श्रीरामचन्द्रजी को वैष्णव धनु ब्रह्मदत्त नामक शस्त्र (बाण ), अक्षय तूणीर एवं खड्ग दिया था । विध्र्य पर्वत के साथ अगस्त्य का सम्बन्ध प्रायः सर्वविदित है । दक्षिण दिशा के साथ अगस्त्य का विशेष रुप से सम्बन्ध प्रतीत होता है । यह भी प्रसिद्ध है कि दक्षिण भारतीयों में एक विशिष्ट प्रकार की संस्कृति का भी प्रसार इन्हीं की देन है । ४ अध्यायों और ३०२ सूत्रों का ‘शक्तिसूत्र इन्हीं की रचना है । इसके अतिरिक्त इनके ग्रन्थों में ‘श्रीविद्या -भाष्य ’ भी है ; यह हयग्रीव से प्राप्त ‘पञ्चदशी विद्या ’ की व्याख्या है । अगस्त्य और लोपामुद्रा दोनों ही श्रीविद्या के उपासक थे । प्रसिद्ध है कि ब्रह्मसूत्र पर भी ऋषि अगस्त्य ने एक टीका लिखी थी । किवंदन्ती के अनुसार श्रीपति पण्डित का श्रीकरभाष्य उन्हीं के मतानुसारी हैं । त्रिपुरा -रहस्य के माहात्म्य -खण्ड से पता चलता है कि अगस्त्य उच्च कोटि के वैदिक ऋषि होते हुए भी मेरु -स्थित श्रीमाता के दर्शनार्थ जब उत्सुक हुए तो दर्शन से वे वंचित इसलिए हो गये कि तब तक उन्हें तान्त्रिक दीक्षा प्राप्त नहीं थी , फलतः श्रीमाता के दर्शनोपयोगी विशुद्ध शाक्त देह भी प्राप्त नहीं थी । अन्त में पराशाक्ति की निगूढ उपासना के निमित्त अधिकार -लाभ के लिए देवी -माहात्म्य के श्रवण के अनन्तर उन्होंणे शाक्त -दीक्षा प्राप्त की । उपासना के प्रभाव से पति -पत्नी दोनें ने ही सिद्धि -लाभ किया । बाद में इनकी सिद्धि का इतना महत्त्व स्वीकार किया गया कि इन दोनों ने ही गुरु -मण्डल में उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया । मानसोल्लास के अनुसार श्रीविद्या के मुख्य उपासकों के बीच अग्स्त्य और लोपामुद्रा दोनों का स्थान है ।
३ . दत्तात्रेय
भगवान्  दत्तात्रेय भी श्रीविद्या के एक श्रेष्ठ उपासक थे । दुर्वासा के समान ये भी आ सूया गर्भ से समुद्भूत थे । प्रसिद्ध के अनुसार इन्होंने शिष्यों के हितसाधन के लिए श्रीविद्या के उपासनार्थ श्रीदत्त -संहिता नामक एक विशाल ग्रन्थ की रचना की थी । बाद में परशुराम ने उसका अध्ययन करके पचास खण्डों में एक सूत्र ग्रन्थ की रचना की थी । कहा जात है कि इनके बाद शिष्य सुमेधा ने दत्त -संहिता और ‘परशुराम कल्प सूत्र ’ का सारांश लेकर ‘त्रिपुर -रहस्य ’ की रचना की । प्रसिद्धि यह भी है कि दत्तात्रेय ‘महाविद्या महाकालिका ’ के भी उपासक थे ।
४ .नन्दिकेश्वर
शिव -भक्त नन्दिकेश्वर भी श्रीविद्या के उपासक थे । ‘ज्ञानार्ण्वतन्त्र ’ में उनकी उपासित विद्या का उद्धार भी किया गया है । इनका रचित ग्रन्थ ’ है । यह छोटा सा कारिकात्मक ग्रन्थ है । इस पर उपमन्यु की टीका है । नन्दिकेश्वर भी षट्त्रिंशत् -तत्त्ववादी थे । वे परम शिव को तत्त्वातीत और विश्व को ३६ तत्त्वों से बना मानते थे । परन्तु इनके द्वारा तत्त्वों की परिगणना में प्रचलित धारा से कुछ विलक्षणता है । इसमें सांख्य सम्मत पञ्चविंशति तत्त्व तो हैं ही , उसके बाद शिव , शक्ति , ईश्वर , प्राणादि -पञ्चक तथा गुण -त्रय भी माने गये हैं । यहाँ प्रधान और गुण -त्रय पृथक् -पृथक्  माने गये हैं । कोई -कोई कहते हैं कि ‘अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ’ यह कारिका नन्दिकेश्वर की कारिको के अन्तर्गत ही है । किसी -किसी ग्रन्थ में लिखा मिलता है कि दुर्वासा मुनि श्रीनन्दिकेश्वर के ही शिष्य थे । यह भी सुना जाता है कि वीरशैवाचार्य प्रभुदेव के वचनों के कन्नड भाषा के टीकाकार दुर्वासा -सम्प्रदाय के ही अन्तर्गत थे ।
५ . श्रीगौडपाद एवं ६ . श्रीशङ्कराचार्य
ऐतिहासिक युग की तरफ दृष्टिपात करने पर दीखेगा कि भारतवर्ष की संस्कृति के वास्तविक प्रतिनिधित्व में श्रीशङ्कराचार्य , उनके पूर्वगामी या उत्तरवर्तियों के अन्तर्गत भी तान्त्रिक उपासकों की न्यूनता नहीं थी । श्रीशङकर के परमगुरु श्रीगौडपाद तथा गुरुदेव श्रीगोविन्दपाद का स्थान भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों के इतिहास में उच्चतम है । इस सम्बन्ध में यहाँ इस दुर्भेद्य रहस्य का संकेत करना असंगत नहीं होगा कि श्रीशङ्कराचार्य एक ओर तो वैदिक धर्म के संस्थापक थे , दूसरी ओर वही तान्त्रिक साधना के उपदेष्टा एवं प्रचारक भी थे । इस रहस्य का उचित समाधान आगे के गवेषकगण करेंगे । शङ्कराचार्य की उभय पक्षों में प्रसिधियाँ हैं , ऊर्ध्वतम और अधस्तन गुरु -परम्पराओं के आलोचन से प्रतीत के आचार्यों को एक समझते हैं , ऊर्ध्वतम और अधस्तन गुरु -परम्पराओं के आलोचन से प्रतीत होता है कि दोनों ओर आचार्य -परस्परायें प्रायः समान ही हैं । कुछ लोग इन दोनों प्रकार के आचार्यों को एक समझते हैं , दूसरे लोग इसे संभव नहीं मानते ; किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वैदिक तथा तान्त्रिक मतों का घनिष्ठ सम्बन्ध आरब्ध हो चुका था । गौडपाद महान्  वैदान्तिक हैं , उनकी माण्डूक्यकारिका अपूर्व रचना है ; यह एक ओर ब्रह्मपदनिष्ठा तथा दूसरी ओर ज्ञान -निष्ठा का परिचायक है । गौडपाद एक ओर जिस प्रकार माध्यमिक अद्वयवाद में पारंगत थे उसी प्रकार पक्षान्तर में योगाचारों के अद्वयवाद में भी माध्यमिक अद्वयवाद में पारंगत थे उसी प्रकार पक्षान्तर में योगाचारो के अद्वयवाद में भी निष्णात थे । बौद्धदर्शन में बे विशिष्ट रुप में प्रविष्ट थे । शून्यवाद तथा विज्ञाप्तिमात्रतावाद दोनों का हीं उन्हें अच्छा परिचय था । आगम -मत में भी उनका ज्ञान उत्कृष्ट कोटि का था , क्योंकि देवीकालोत्तर का कोई -कोई वचन उनकी कारिकाओं में उपलब्ध होता हैं ’ क्योंकि देवीकालोत्तर का कोई -कोई वचन उनकी कारिकाओं में उपलब्ध होता हैः अवश्य ही इस पर अधिक जोर दिया जा सकता है । वैदिक गौडपाद का यही स्वरुप है ।
आगम की दृष्टी से जान पडता है कि वे समयाचार -सम्मत तान्त्रिक मत के पोषक थे । उनकी ‘सुभगोदय -स्तुति ’ प्राचीन स्तुतियों में प्रधान है । इस बहुत सी टीकायें थीं । प्रसिद्धि के अनुसार इस पर शंकर ने भी टीका लिखी थी । इनकी एक रचना ‘श्रीविद्यारत्नसूत्र ’ है , इस पर भी बहुत सी टीकायें हैं । सुना जाता है कि गौडपाद ने उत्तर -गीता की तरह ही देवीमाहात्म्य की भाष्य -रचना भी की थी । देवी -माहात्म्या की टीका का नाम चिदानन्द्रकमल (?) हैं । इसके लेखक तान्त्रिक नाम से परिचित गौडपाद हैं , यह भी परमहंस परिव्राजकाचार्य और अद्वैत विद्या में निष्णात थे ।
भगवान्  शंकराचार्य के विषय में चार प्राचीन ग्रन्थों से कुछ विवरणों का संग्रह किया गया है , जिनके समालोचन से उनके विषय में वैदिकत्त्व , तान्त्रिकत्व आदि आरोपणों का निर्धारण हो सकेगा ।
( १ ) प्रथम ग्रन्थ का नाम श्रीक्रमोत्तम हैं इसका निर्माण - काल प्रायः चार सौ पचास वर्ष पूर्व है । इस ग्रन्थ में शंकर की एक गुरु - परम्परा दी गयी है , उससे पता चलता है कि आदि गुरु शिव से लेकर वशिष्ठ , शक्ति , पराशर , व्यास , शुकदेव , गौडपाद , गोविन्दपाद और शंकर का क्रम है । इसके अनुसार शंकर के शिष्य विश्वदेव थे , उनके बाद बोधघन , ग्रन्थकार मल्लिकार्जुन तक का क्रम है । इस ग्रन्थ का विषय श्रीविद्या है ।
( २ ) द्वितीय ग्रन्थ है --- सुमुखि पूजा - पद्धति । इस ग्रन्थ विषय मातंगीपूजा हैं । यह ग्रन्थ सुन्दरानन्दनाथ के शिष्यं शंकर की रचना है । इस ग्रन्थ में ऊर्ध्वतम शिव से गोविन्दपाद तक का क्रम एक समान दिखाई पडता है , उसके बाद शंकर । परन्तु शंकर के अनन्तर पहले हँ बोधघन और उसके बाद ज्ञानघन ; इस प्रकार परम्परा का क्रम भारती तीर्थ तक अवतीर्ण हुआ है ।
( ३ ) तृतीय ग्रन्थ है --- श्रीविद्यार्णव । यह ग्रन्थ संप्रति प्रसिद्ध है। इससे जान पडता है कि शंकर के १४ शिष्य थे , ५ भिक्षु तथा ९ गृहस्थ।
( ४ ) चौथा ग्रन्थ है --- भुवनेश्वरी - रहस्य । पृथ्वीधर शंकर के शिष्य , गोविन्दपाद के प्रशिष्य और गौडपाद के वृद्धप्रशिष्य थे ।
इन सब के परिशीलन से ज्ञान होता है कि शंकर श्रीविद्या के अतिरिक्त मातंगी और श्रीभुवनेश्वरी के भी उपदेष्टा थे । आशा है , ऐतिहासिक विद्वान्  इस विषय में गवेषणा करेंगे ।
एक बात और भी है शंकर को शिष्य कोटि में वेदान्त प्रस्थान के जो आचार्य पदमपाद हैं , जिन्होंने पञ्चपादिका की रचना की थी , क्या उन्होंने ही शंकर कृत प्रपञ्चसार पर टीका भी लिखी थी ? कोई -कोई प्राचीन आचार्य इस पर विश्वास करते हैं , किन्तु वर्तमान पण्डितगण इस पर संशय करते हैं । श्री शंकर की तान्त्रिक रचनाओं में प्रपञ्चसार प्रधान माना जाता है , उसके बाद सौन्दर्य -लहरी प्रभृति को । आनन्द -लहरी की सौभाग्य -वर्धिनी टीका में श्री शंकर कृत एक ‘क्रम -स्तुति ’ की बात मिलती है , जिसमें एक प्रसिद्ध श्लोक है , जिसका तात्पर्य है कि वेद के अनुसार माया -बीज ही भगवती पराशक्ति का नाम है और यही पराशक्ति जगन्माता त्रिपुरा और त्रियोनि -रुपा है । अभिनवगुप्त की परात्रिंशिका में क्रमस्तोत्र की जो बात कही गयी है , वह विचारणीय हैं कि क्या वह शङ्कराचार्य कृत क्रम -स्तोत्र तो नहीं है ?


We have tried our best to check facts. But We are humans. Human nature is to do mistake . so please verify facts, if you feel we are wrong. We are sorry for that.In case you find any mistake in our video , then inform us. we will try to rectify it. English To Hindi translations are not in literal sense.Please do not use social media for news. Before believing any news on social media, confirm it from any reliable source. 
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Monday, April 9, 2018

Caste System and its Reality : जाति परंपरा और इसकी वास्तविकता (Part 1)


The Scheduled Castes (SCs) and Scheduled Tribes (STs)

अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी)



The Scheduled Castes (SCs) and Scheduled Tribes (STs) are various officially designated groups of historically disadvantaged people in India. The terms are recognized in the Constitution of India and the various groups are designated in one or other of the categories. For much of the period of British rule in the Indian subcontinent, they were known as the Depressed Classes.


अनुसूचित जाति (अनुसूचित जातियों) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) भारत में ऐतिहासिक रूप से वंचित लोगों के लिए आधिकारिक शब्द हैं। ये शब्द भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त हैं और इन शब्दों के तहत विभिन्न समूहों को एक या अन्य श्रेणियों में नामित किया गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश शासन की अधिकांश अवधि के लिए, उन्हें शोषित वर्ग के रूप में जाना जाता था।

Since the 1850s these communities were generally referred to as Exploited Classes, with the Schedule Caste and Scheduled Tribes also being known as Adivasi (or "original inhabitants").

https://en.wikipedia.org/wiki/Scheduled_Castes_and_Scheduled_Tribes, 22:33 PM, 07/04/2018Scheduled Castes (SCs) and Scheduled Tribes (STs) are among the most disadvantaged socio-economic groups in India.


1850 के बाद से इन समुदायों को आमतौर पर शोषित वर्ग के रूप में जाना जाता है, आदिवासी (या "मूल निवासियों") को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नाम से जाना जाता है| अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति भारत के सबसे वंचित सामाजिक-आर्थिक समूहों में से हैंArticle 366 (25) defined scheduled tribes as "such tribes or tribal communities or parts of or groups within such tribes or tribal communities as are deemed under Article 342 to be Scheduled Tribes for the purposes of this constitution". Article 342, which is reproduced below, prescribes the procedure to be followed in the matter of specification of scheduled tribe.

अनुच्छेद 366 (25), अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित किया गया है।http://vikaspedia.in/social-welfare/scheduled-tribes-welfare/ministry-of-tribal-welfareMust read for Article 342.Article 342 provides for specification of tribes or tribal communities or parts of or groups within tribes or tribal communities which are deemed to be for the purposes of the Constitution the Scheduled Tribes in relation to that State or Union Territory. In pursuance of these provisions, the list of Scheduled Tribes are notified for each State or Union Territory and are valid only within the jurisdiction of that State or Union Territory and not outside.

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कोई उपयुक्त अनुवाद उपलब्ध नहीं है।

Scheduled castes are those castes/races in the country that suffer from extreme social, educational and economic backwardness arising out of age-old practice of untouchability and certain others on account of lack of infrastructure facilities and geographical isolation, and who need special consideration for safeguarding their interests and for their accelerated socio-economic development. These communities were notified as Scheduled Castes as per provisions contained in Clause 1 of Article 341 of the Constitution.

अनुसूचित जाति वह देश में जातियां हैं जो अस्पृश्यता की पुरानी परंपरा से उत्पन्न होने वाली अत्यधिक सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त हैं। अनुसूचित जाति वह जातियां हैं जिनके हितों की सुरक्षा के लिए और त्वरित सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विशेष विचार की आवश्यकता है। इन समुदायों को संविधान के अनुच्छेद 341 के खंड 1 में निहित प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया था।

https://timesofindia.indiatimes.com/india/how-supreme-court-viewed-words-hindu-hinduism-hindutva-in-rulings/articleshow/62782807.cms How Supreme Court viewed words ‘Hindu’, ‘Hinduism’ & ‘Hindutva’ in rulings Must Read Any person, who follows culturally or religiously to aspects of Hinduism, can be called as Hindu. Historically it has been used as a geographical, cultural, and later religious identification for people of the Indian subcontinent.
The historical meaning of the term Hindu has evolved with time. Starting with the Persian and Greek references to the land of the Indus in the 1st millennium BCE through the texts of the medieval era, the term Hindu implied a geographic, ethnic or cultural identifier for people living in the Indian subcontinent around or beyond the Sindhu (Indus) river. By the 16th century, the term began to refer to residents of the subcontinent who were not Turkic or Muslims.
Borrowing from Latin Indus, from Ancient Greek Ἰνδός (Indós), from Old Persian(hiⁿduš), from Proto-Iranian *hindu- (compare Avestan ‎ (hiṇdu-)), from Proto-Indo-Iranian *sindʰus or borrowed from Sanskrit सिन्धु (síndhu).
किसी भी व्यक्ति, जो हिंदू धर्म के सांस्कृतिक या धार्मिक पहलुओं का पालन करता है, को हिंदू कहा जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से यह शब्द भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, पहचान के रूप में उपयोग किया गया है।
हिंदू शब्द का ऐतिहासिक अर्थ समय के साथ विकसित हुआ है। 1 सहस्त्राब्दी बीसीई में, फारसी और यूनानी ने सिंधु की भूमि के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया|मध्ययुगीन युग के ग्रंथों ने हिन्दू को भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु (इंडस) नदी के पार या उससे आगे रहने वाले लोगों के लिए पहचान के रूप में परिभाषित किया।16 वीं शताब्दी से, इस शब्द का इस्तेमाल उपमहाद्वीप के निवासियों के लिए करना शुरू हुआ, जो तुर्क या मुस्लिम नहीं थे।
Dr. Ambedkar viewed the Shudras as Aryas and rejected the Aryan invasion theory. Dr.  Ambedkar described it as absurd. He had said in his book "Who Were the Shudras?" (1946). Aryan invasion theory should have been dead long ago .
डॉ अंबेडकर ने शूद्रों को आर्य के रूप में देखा और आर्यन आक्रमण सिद्धांत को खारिज कर दिया। डॉ अंबेडकर ने इसे बेतुका बताया। उन्होंने अपनी पुस्तक "हू वेर द शूद्र्स?" में कहा था (1946)| आर्यन आक्रमण सिद्धांत बहुत पहले ही मृत होना चाहिए था।
https://en.wikipedia.org/wiki/Aryan_invasion_theory  (This Theory is dead by now. Please Don’t believe in it. ) Theories postulating prehistoric Indo-Aryan migrations:
Mortimer Wheeler's theory that Indo-Aryan invaders overthrew the Indus Valley Civilization; refuted by many archeologists after new excavations at Harappan sites.
Indo-Aryan migration theory, that the Indo-Aryans migrated into the Indian subcontinent
Indigenous Aryans theory, that the Indo-Aryans originated within the Indian subcontinent, but rejected by most linguists.
A series of lectures on the Aryan issue - PART 01 (https://www.youtube.com/watch?v=RT4pUJMDV2Y)
A series of lectures on the Aryan issue - PART 02
A series of lectures on the Aryan issue - PART 03
A series of lectures on the Aryan issue - PART 04
A series of lectures on the Aryan issue - PART 05
Meluhha: the Indus Civilization and Its Contacts with Mesopotamia
Science in Ancient India: Sanskrit-based Knowledge Systems" by Prof. Michel Danino-IITR (https://www.youtube.com/watch?v=vfofx7piJDk)
Guest Lecture by Dr. R N Iyengar on 'Natural Sciences and Astronomy in Ancient India'(https://www.youtube.com/watch?v=3MMmgjDmww4)
Michel Danino: 12 Great achievements of Indian Civilization(https://www.youtube.com/watch?v=xmogKGCmclE)
A lecture at IIT Gandhinagar on 6 September 2016
India ki Khoj Talk by Michel Danino (https://www.youtube.com/watch?v=FpzF_ukaojI
Lecture-01_Recent Findings on Indus-Sarasvati Civilization- IIT Kanpur
Lecture-02-The Aryan Controversy- IIT Kanpur(https://www.youtube.com/watch?v=FL6nxDn3cmE&t=690s)
Lecture-03- Recent Findings on the Ganga-Vindhya Civilization-IIT Kanpur
Lecture-04-Sacred Geography and the Making of India- IIT Kanpur
Lecture-05- India’s Interface with the Western World-IIT Kanpur
Lecture-06-India’s Interface with the Eastern World- IIT Kanpur
Lecture-07-Ancient Indian Architecture and Sacred Geometry- IIT Kanpur
Lecture-08- Ayodhya through the Ages and the Temple Controversy-IIT Kanpur(https://www.youtube.com/watch?v=vbCsG9dsVtI)
Lecture-09- Indian Education in Principle and Practice-IIT Kanpur
Lecture-11- Water Management in Ancient India-IIT Kanpur
Lecture-12- Highlights of Science in Ancient India – Part 1-IIT Kanpur
Lecture-13- Highlights of Science in Ancient India – Part 2-IIT Kanpur
Lecture-14-Indian Ethics and Values- IIT Kanpur(https://www.youtube.com/watch?v=XO7AbUuW2Po)
Guest lecture by Prof.H.C.Verma on "Surgery practices in India from ancient times"(https://www.youtube.com/watch?v=MSszQDh3CLk)

Manusmriti : Dharmaśāstr, Historical Debate, British colonial law??मनुस्मृति: धर्मशास्त्र, ऐतिहासिक बहस, ब्रिटिश औपनिवेशिक कानून??


Mahabharat Episode -27- (10:00 min-30:00 min.), Yudhishthir become prince. (https://www.youtube.com/watch?v=Bb-lH-pikR8)Time: 10:00 min-30:00 min.
Hindu society, caste, and gender (https://www.youtube.com/watch?v=H-rU3thF6bE&t=32s) by Dr Nick Sutton of the Oxford Centre for Hindu Studies.
Units of time,  समय की इकाइयां
14 Manvantara = 1000 Mahā-Yugas = 1 Kalpa = 1 day (day only) of Brahma. (2 Kalpas constitute a day and night of Brahma). Satya Yuga + Treta Yuga+ Dvapara Yuga + Kali Yuga = 1 Mahā-Yuga (4.32 million solar years). A Manvantara consists of 71 Mahā-Yuga (306,720,000 solar years). Each Manvantara is ruled by a Manu. Brahma lives for 100 Brahma years. We are currently in the first 'day' of the 51st year of our Brahma. This Brahma's day, Kalpa is named as Shveta-Varaha Kalpa. Within this Day, six Manvantaras have already elapsed and this is the seventh Manvantara, named as – Vaivasvatha Manvantara.
14 मन्वन्तर =1000 महायुग= 1 कल्प = ब्रह्मा का 1 दिवस (केवल दिन) ( दो कल्प ब्रह्मा के एक दिन और रात बनाते हैं)| एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं| प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते है|एक महायुग (43 लाख 20 हजार सौर वर्ष) =सत युग+त्रेता युग+द्वापर युग+कलि युग|ब्रह्मा की आयु १०० वर्ष ह है फिर ब्रह्मा मर जाते है और दूसरा देवता ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करते हैं|आप वर्तमान ब्रह्मा के इक्यावनवें वर्ष में सातवें मनु, वैवस्वत मनु के शासन में सॄजित हुए हैं।
Who is Manu? What is Manu?  मनु कौन है? मनु क्या है? 
Generally speaking, A kalpa is the period of time between the creation and recreation of a world or universe. 1 kalpa = 4.32 billion years.
In some Puranic mythology, each kalpa consists of fourteen Manvantaras, and each Manvantara is headed by a different Manu. The current universe, in this mythology, is asserted to be ruled by the 7th Manu named Vaivasvata. The Sanskrit term for 'human', मानव (IAST: mānava) means 'of Manu' or 'children of Manu'.
वर्तमान में वैवस्वत मनु (7वें मनु) हैं।आम तौर पर, एक कल्प एक विश्व या ब्रह्मांड के निर्माण और पुन: निर्माण के बीच का समय है 1 कल्प = 4.32 अरब साल।
मानव का हिन्दी में अर्थ है वह जिसमें मन, जड़ और प्राण से कहीं अधिक सक्रिय है। मनुष्य में मन की शक्ति है, विचार करने की शक्ति है, इसीलिए उसे मनुष्य कहते हैं। सभी मनुष्य, मनु की संतानें हैं इसीलिए मनुष्य को मानव भी कहा जाता है|
In Hindu religion, it is said all other Manus comes from the family of Svayambhuva Manu. Mahabharat gives name of 8 manus only. Jain religious scriptures and Shveta-VarahaKalpa told us about 14 Manus.
Name of 14 Manus are:
Svayambhuva Manu, Svarocisha Manu, Uttama Manu, Tapasa Manu, Raivata Manu, Cakshusha Manu, Vaivasvata Manu, Savarni Manu, Daksha-savarni Manu, Brahma-savarni Manu, Dharma-savarni Manu, Rudra-savarni Manu, Deva-savarni Manu, Indra-savarni Manu.
हिंदू धर्म में स्वायंभुव मनु के ही कुल में आगे चलकर स्वायंभुव सहित कुल मिलाकर क्रमश: १४ मनु हुए। महाभारत में ८ मनुओं का उल्लेख मिलता है व श्वेतवराह में १४ मनुओं का उल्लेख है। जैन ग्रन्थों में १४ कुलकरों का वर्णन मिलता है।
चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार से हैं:
स्वायम्भु मनु , स्वरोचिष मनु, औत्तमी मनु, तामस मनु, रैवत मनु, चाक्षुष मनु, वैवस्वत मनु या श्राद्धदेव मनु, सावर्णि मनु, दक्ष सावर्णि मनु, ब्रह्म सावर्णि मनु, धर्म सावर्णि मनु, रुद्र सावर्णि मनु, देव सावर्णि मनु या रौच्य मनु, इन्द्र सावर्णि मनु या भौत मनु|
So Manu is the name of post which was/is/will be held by different mythological men of different kalpas.It is not name of any man.
Manusmriti And Manu : Unresolved Debate (मनुस्मृति और मनु: अनसुलझी धार्मिक बहस)
In Shatpath Brahmin, Vaivasvata Manu and Shardha is considered as progenitors of humanity. He was considered as the king of earth that has seven continents. He is considered as presenter of Manusmriti. But his original creation was lost with time. No original copy is available today. Some people say that in his original copy “Varana” means color, not caste. However, it can not be verified that such text even existed. 
शतपथ ब्राह्मण में मनु को श्रद्धादेव कहकर संबोधित किया गया है। श्रीमद्भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना गया है। महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। इन्हीं ने मनुस्मृति नामक ग्रन्थ की रचना की थी जो आज मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। उसके अर्थ का अनर्थ ही होता रहा है। उस काल में वर्ण का अर्थ रंग होता था और आज जाति।
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81
According to some people, The title of the text Manusmriti uses this term as a prefix, but refers to the first Manu – Svayambhuva, the spiritual son of Brahma.
Roshen Dalal (2010). The Religions of India: A Concise Guide to Nine Major Faiths. Penguin Books. 
The problem in this logic: Universe/Kalpa of first Svayambhuv Manu is different,  Many religious teachers may not agree with this. 
In Vishnu Purana, Vaivasvata Manu, Satyavrata, was the king of Dravida before the great flood. He was warned of the flood by the Matsya (fish) avatar of Vishnu. He built a boat that carried the Vedas, Manu's family and the seven sages to safety. This myth is similar to other flood myths such as that of Gilgamesh (an Akkadian poem that is considered the first great work of literature, and in earlier Sumerian poems. ) and Bible.
Alain Daniélou (11 February 2003). A Brief History of India. Inner Traditions / Bear & Co. pp. 19
कुछ लोगों का मानना है कि पहले मनु (स्वायंभुव मनु) मनुस्मृति के प्रस्तुतकर्ता है|
इस तर्क में समस्या: पहले मनु (स्वायंभुव मनु) का कल्प अलग है, कई धार्मिक शिक्षक इस बात से सहमत नहीं हैं।
विष्णु पुराण में; द्रविड़ राजा वैवस्वत मनु, महान बाढ़ से पहले सप्तद्वीपवती पृथ्वी का राजा था।
उन्हें विष्णु के मत्स्य (मछली) अवतार द्वारा बाढ़ की चेतावनी दी गई। उन्होंने एक नाव बनाया जिसमें वेद, मनु के परिवार और सात ऋषियों की सुरक्षा थी। यह मिथक गल्गामेश और बाइबिल जैसे अन्य बाढ़ के मिथकों के समान है|
Manusmriti : Historical Debate, मनुस्मृति: ऐतिहासिक बहस
The Manusmṛti (or "Laws of Manu", Sanskrit Manusmṛti मनुस्मृति; also known as Mānava-Dharmaśāstra मानवधर्मशास्त्र) is the important and earliest metrical work of the Dharmaśāstra (धर्मशास्त्र) textual tradition of Hinduism.
There are many Dharmashastras, variously estimated to be 18 to about 100, with different and conflicting points of view.
Pandurang Vaman Kane mentions over 100 different Dharmasastra texts were known by the Middle Ages in India, but most of these are lost to history and their existence is inferred from quotes and citations in bhasya and digests that have survived. John Bowker (2012), The Message and the Book: Sacred Texts of the World's Religions, Yale University Press.
मनुस्मृति ("मनु का कानून") हिंदू धर्म की धर्मशास्त्र शास्त्रीय परंपरा का महत्वपूर्ण और प्रारंभिक कार्य है।मनुस्मृति के बहुत से संस्करण उपलब्ध हैं। कालान्तर में बहुत से प्रक्षेप भी स्वाभाविक हैं। 
कई धर्मशास्त्र हैं| उनकी संख्या का अनुमान 18 से 100 के बीच है|उनका दृष्टिकोण विरोधाभासी है|
पांडुरंग वामन काणे, सामाजिक सुधार को समर्पित एक महान विद्वान्, ने इस पुरानी परंपरा को जारी रखा है। उनका धर्मशास्त्र का इतिहास, पाँच भागों में प्रकाशित है, प्राचीन भारत के सामाजिक विधियों तथा प्रथाओं का विश्वकोश है। इससे हमें प्राचीन भारत में सामाजिक प्रक्रिया को समझने में मदद मिलती है।"
About 20 Dharmasutras are known, some surviving into the modern era just as fragments of their original. Four Dharmasūtras have been translated into English, and most remain in manuscripts. All carry the names of their authors, but it is still difficult to determine who these real authors were. The most important of these texts are the sutras of Apastamba, Gautama, Baudhayana, and Vasistha. There is uncertainty regarding the dates of these documents due to lack of evidence concerning these documents. here is confusion regarding the geographical provenance of these documents.
The extant Dharmasutras are written in concise sutra format, with a very terse incomplete sentence structure which are difficult to understand and leave much to the reader to interpret. The Dharmasastras are derivative works on the Dharmasutras, using a shloka (four 8-syllable verse style chandas poetry, Anushtubh meter), which are relatively clearer.
आधुनिक युग में लगभग 20 धर्मशास्त्र ज्ञात हैं|आधुनिक युग में उनके मूल पाठ के छोटे टुकड़े हमें ज्ञात हैं|चार का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है, और अन्य का अभी तक अनुवाद नहीं किया गया है।हालांकि सभी अपने लेखकों के नाम लेते हैं, लेकिन यह निर्धारित करना अभी भी कठिन है कि ये वास्तविक लेखक कौन थे।इनमें से सबसे महत्वपूर्ण में अपास्तम्ब, गौतम, बौद्ध्यन और वसिष्ठ के सूत्र है।
साक्ष्यों की कमी के कारण; इन दस्तावेजों की तारीखों के बारे में अनिश्चितता है इन दस्तावेजों की भौगोलिक स्थिति के बारे में भ्रम है।
The extant Dharmasutras are written in concise sutra format, with a very terse incomplete sentence structure which are difficult to understand and leave much to the reader to interpret. That’s why some people misused them. The Dharmasastras are derivative works on the Dharmasutras, using a shloka (four 8-syllable verse style chandas poetry, Anushtubh meter), which are relatively clearer.
धर्मसुत्र संक्षिप्त सूत्र प्रारूप में लिखे गए हैं। इसकी संक्षिप्त वाक्य संरचनाओं को समझना मुश्किल है। पाठक, उनकी व्याख्या, अपनी मानसिकता के अनुसार कर सकते हैं|यह पाठक की व्याख्या के लिए खुला है (उसकी पसंद के अनुसार)।यही कारण है कि कुछ लोगों ने इसका दुरुपयोग किया।धर्मशास्त्र (मनुस्मृति, यज्ञवल्क्य स्मृती आदि) धर्मसुत्रों के व्युत्पन्न लेखन हैं|धर्मशास्त्र श्लोक शैली का उपयोग करते है।
The word Dharmaśāstras never appears in the Vedic texts, and the word śāstra itself appears for the first time in Yaska's Nirukta text. Katyayana's commentary on Panini's work (~3rd century BCE), has the oldest known single mention of the word Dharmaśāstras. The extant Dharmaśāstras texts are listed below:
The Manusmriti (~ 2nd to 3rd century CE), The Yājñavalkya Smṛti (~ 4th to 5th-century CE) The Nāradasmṛti (~ 5th to 6th-century CE),  Viṣṇusmṛti (~ 7th-century CE). Evidence suggests that Yajnavalkya Smriti, state Ghose and other scholars, was the more referred to text than Manu Smriti, in matters of governance and practice. This text, of unclear date of composition, but likely to be a few centuries after Manusmriti, is more "concise, methodical, distilled and liberal".
Patrick Olivelle (2005), Manu's Code of Law, Oxford University Press.
Timothy Lubin, Donald R. Davis Jr & Jayanth K. Krishnan 2010, p. 57.
M Rama Jois (2004), Legal and Constitutional History of India, Universal Law Publishing, page 31
शब्द “धर्मशास्त्र” वेदों में मौजूद नहीं है। शब्द “धर्मशास्त्र” Yaska's Nirukta में पहली बार आता है।पाणिनी के कार्य (3 शताब्दी ईसा पूर्व) पर कैत्यायान की टिप्पणी, में “धर्मशास्त्र” शब्द का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख है।मौजूदा धर्मशास्त्र नीचे सूचीबद्ध हैं:मनुस्मृति (2-3शताब्दी), यज्ञवल्क्य स्मृति (4-5 शताब्दी), नारद स्मृति(5-6 शताब्दी), विष्णु स्मृति (700 AD). साक्ष्य से पता चलता है कि शासन के मामले में यज्ञवल्क्य स्मृति, राज्य घोष और अन्य विद्वानों की स्मृतियां, मनुस्मृति की तुलना में ज्यादा इस्तेमाल की जाती थीं। मनुस्मृति के मुकाबले ये स्मृतियां अधिक "संक्षिप्त, व्यवस्थित, परिष्कृत और उदार" हैं|
Time of compilation of manusmriti (MS) is not clear. Many scholars have  debated on this subjects. Some says there are texts before manusmriti, some man in past used them to create MS. Many quotations of manusmriti can not be found in texts like Mahabharata. However Quotations of Manu (present in other religious scriptures)  may be found in MS. This assumption that present form of MS is a more a commentary than law , seems to be true. 
मनुस्मृति के काल एवं प्रणेता के विषय में नवीन अनुसंधानकारी विद्वानों ने पर्याप्त विचार किया है। उनमे से कुछ कहते हैं कि मनुस्मृति से पहले कोई 'मानव धर्मसूत्र' था,  जिसका आश्रय लेकर किसी ने एक मूल मनुस्मृति बनाई थी| जो बाद में बिगड़ कर होकर वर्तमान रूप में प्रचलित हो गई। मनुस्मृति के अनेक विचार या वाक्य, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते हैं| यह अनुमान बहुत कुछ तर्कसंगत प्रतीत होता है कि  धर्मशास्त्र के नाम से
विषय परक वाक्य समाज में प्रचलित थे, जिनका निर्देश महाभारत आदि में है तथा जिन वचनों का आश्रय लेकर वर्तमान मनुसंहिता बनाई गई|
The Sanskrit text was edited in 1913 by P. H. Pandya and in 1920 by J.R. Gharpure. The text was first translated into English (from manuscripts) in 1794 by Sir William Jones. The text's fame spread outside India, long before the colonial era. The medieval era Buddhistic law of Myanmar and Thailand are also ascribed to Manu, and the text influenced past Hindu kingdoms in Cambodia and Indonesia.
Steven Collins (1993), The discourse of what is primary, Journal of Indian philosophy, Volume 21, pages 301-393.
Robert Lingat (1973), The Classical Law of India, University of California Press, ISBN 978-0520018983, page 77.
Patrick Olivelle (2005), Manu's Code of Law, Oxford University Press.
Scholars doubt Manusmriti was ever administered as law text in ancient or medieval Hindu society. David Buxbaum states, "in the opinion of the best contemporary orientalists, it [Manusmriti] does not, as a whole, represent a set of rules ever actually administered in Hindustan. It is in great part an ideal picture of that which, in the view of a Brahmin, ought to be law". David Buxbaum (1998), Family Law and Customary Law in Asia: A Contemporary Legal Perspective, Springer Academic.
विलियम जोन्स द्वारा 1794 में मनुस्मृति का प्रथम अंग्रेजी (पांडुलिपियों से) अनुवाद किया गया था।इसकी प्रसिद्धि भारत के बाहर, औपनिवेशिक युग से बहुत पहले फैल गई थी।म्यांमार और थाईलैंड के मध्यकालीन युग बौद्ध के कुछ कानून भी मनुस्मृति पर आधारित हैं।मनुस्मृति ने कंबोडिया और इंडोनेशिया में पिछले हिंदू साम्राज्यों को प्रभावित किया।विद्वानों को शक है कि मनुस्मृति प्राचीन या मध्ययुगीन हिंदू समाज में कानून में प्रयोग नहीं किया गया था।डेविड बक्सबौम कहते हैं, "सर्वश्रेष्ठ समकालीन प्राच्यवादियों की राय में, वास्तव में मनुस्मृति पूरी तरह से, हिन्दूस्तान में नैतिक और कानूनी नियमों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।” 
Donald Davis writes, "there is no historical evidence for either an active propagation or implementation of Dharmasastra [Manusmriti] by a ruler or any state – as distinct from other forms of recognizing, respecting and using the text. Thinking of Dharmasastra as a legal code and of its authors as lawgivers is thus a serious misunderstanding of its history". Other scholars have expressed the same view, based on epigraphical, archeological and textual evidence from medieval Hindu kingdoms in Gujarat, Kerala and Tamil Nadu, while acknowledging that Manusmriti was influential to the South Asian history of law and was a theoretical resource.
डोनाल्ड डेविस लिखते हैं, "एक शासक या किसी भी राज्य द्वारा धर्मशास्त्र के सक्रिय प्रचार या कार्यान्वयन के लिए कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है|धर्मशास्त्र को कानून की संहिता मानना और इसके लेखकों को कानून विद मानना, एक गंभीर एतिहासिक गलती है|शिलालेखों, पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर  दूसरे एतिहासकारो का भी यही मानना है|  
Donald Davis (2010), The Spirit of Hindu Law, Cambridge University Press.  Werner Menski (2009), Hindu Law: Beyond Tradition and Modernity, Oxford University Press.  Donald R Davis Jr (2005), Intermediate Realms of Law: Corporate Groups and Rulers in Medieval India, Journal of the Economic and Social History of the Orient, Volume 48, Issue 1, pages 92–117.
Prior to the British colonial rule, Sharia (Islamic law) for Muslims in South Asia had been codified as Fatawa-e-Alamgiri, but laws for non-Muslims – such as Hindus, Buddhists, Sikhs, Jains, Parsis – were not codified during the 600 years of Islamic rule. With the arrival of the British colonial officials, Manusmriti played a historic role in constructing a legal system for non-Muslims in South Asia and early Western perceptions about the ancient and medieval Indian society.
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से पहले, दक्षिण एशिया में मुसलमानों के लिए शरिया (इस्लामी कानून) को फतवा-ए-आलमगिरी में संहिताबद्ध किया गया था| लेकिन गैर-मुसलमानों (जैसे हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी) के लिए कानून - इस्लामी शासन के 600 वर्षों के दौरान संहिताबद्ध नहीं किये थे|ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों के आगमन के साथ, मनुस्मृति ने दक्षिण एशिया में गैर-मुस्लिमों के लिए एक कानूनी प्रणाली का निर्माण करने में भूमिका निभाई|  Lariviere, Richard W. (November 1989). "Justices and Paṇḍitas: Some Ironies in Contemporary Readings of the Hindu Legal Past". Journal of Asian Studies. Association for Asian Studies. 48 (4): 757–769. 
The East India Company, and later the British Crown, sought profits for its British shareholders through trade as well as sought to maintain effective political control with minimal military engagement. The administration pursued a path of least resistance, relying upon co-opted local intermediaries that were mostly Muslims and some Hindus in various princely states. The British exercised power by avoiding interference and adapting to law practices as explained by the local intermediaries. The existing legal texts for Muslims, and resurrected Manusmriti manuscript thus helped the colonial state sustain the pre-colonial religious and political law and conflicts, well into the late nineteenth century.
Washbrook, D. A. (1981). "Law, State and Agrarian Society in Colonial India". Modern Asian Studies. 15 (3): 649–721.Tomothy Lubin et al (2010), Hinduism and Law: An Introduction (Editors: Lubin and Davis), Cambridge University Press.Ludo Rocher (1978), Hindu Conceptions of Law, Hastings Law Journal, Volume 29, pages 1283-1297.
ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश क्राउन, अपने ब्रिटिश शेयरधारकों के लिए व्यापार के जरिए मुनाफा कमाना चाहते थे। वे न्यूनतम सैन्य हस्तक्षेप के साथ प्रभावी राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे।प्रशासन ने कम से कम प्रतिरोध का रास्ता अपनाया ब्रिटिश प्रशासन विभिन्न रियासतों में स्थानीय मध्यस्थों पर निर्भर थे। उनमें से ज्यादातर मुसलमान और कुछ हिंदू थे। ब्रिटिश शासन ने प्रतिरोध को कम करने के लिये इन के द्वारा सुझाये गये रास्तो का पालन करने की कोशिश की|
मुसलमानों के लिए मौजूदा कानूनी ग्रंथों और मनुस्मृति पांडुलिपि को पुनर्जीवित करने से औपनिवेशिक राज्य में धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों को बनाए रखने में मददमिली| फूट डालो और शासन करो|
For Muslims of India, the British accepted sharia as the legal code for Muslims, based on texts such the al-Sirjjiyah and Fatawa-i Alamgiri written under sponsorship of Aurangzeb. For Hindus and other non-Muslims such as Buddhists, Sikhs, Jains, Parsis and Tribal people, this information was unavailable. The substance of Hindu law, was derived by the British colonial officials from Manusmriti, and it became the first Dharmasastra that was translated in 1794. The British colonial officials, for practice, attempted to extract from the Dharmaśāstra, the English categories of law and religion for the purposes of colonial administration.
The British colonial officials, however, mistook the Manusmriti as codes of law, failed to recognize that it was a commentary on morals and law and not a statement of positive law. The colonial officials of the early 19th century also failed to recognize that Manusmriti was one of many competing Dharmasastra texts, it was not in use for centuries during the Islamic rule period of India.
भारत के मुसलमानों के लिए, अंग्रेजों ने कानूनी कोड के रूप में शरिया को स्वीकार किया|शरिया के नियम अल-दीरियाह और फतवा-ए आलमगिरी पर आधारित थे, जिन्हें औरंगजेब ने  लिखवाया था। हिन्दू और अन्य गैर-मुस्लिम जैसे बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और आदिवासी लोगों के लिए, इस प्रकार की कानूनी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा लगभग मृत और बेकार मनुस्मृति से हिंदू कानून के तत्वों की खोज की गई थी|।यह पहला धर्मशास्त्र था, जिसका अनुवाद 17 9 4 में हुआ था।
Michael Anderson (1995), Institutions and Ideologies: A SOAS South Asia Reader (Studies in Asian Topics, Editors: David Arnold, Peter Robb), Routledge, ISBN 978-0700702848, Chapter 10;
K Ewing (1988), Sharia and ambiguity in South Asian Islam, University of California Press, ISBN 978-0520055759
The British colonial officials, for practice, attempted to extract from the Dharmaśāstra, the English categories of law and religion for the purposes of colonial administration.
As per modern scholars, The British colonial officials, however, mistook the Manusmriti as codes of law, failed to recognize that it was a commentary on morals and law and not a statement of positive law. The colonial officials of the early 19th century also failed to recognize that Manusmriti was one of many competing Dharmasastra texts, it was not in use for centuries during the history of India.
ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने धर्मशास्र से ब्रिटिश कानून और धर्म के समान कानूनी व्यवस्था निकालने का प्रयास किया। ताकि वे इस कॉलोनी पर शासन कर सकें|
आधुनिक विद्वानों के अनुसार, ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने गलती से मनुस्मृति को कानून के कोड के रूप में समझ लिया।
वे यह मानने में नाकाम रहे कि मनुस्मृति नैतिकता और कानून पर टिप्पणी थी, नाकि एक कानूनी प्रणाली|19वीं शताब्दी के शुरुआती औपनिवेशिक अधिकारियों वे यह समझने में नाकाम रहे कि मनुस्मृति कई धर्मशास्त्र ग्रंथों में से एक था| जिन में कई विषयों पर परस्पर विरोधी विचार हैं| जिन में कई, भारत के इतिहास के दौरान शताब्दियों से  प्रयोग में नहीं थे।
Michael Anderson (1995), Institutions and Ideologies: A SOAS South Asia Reader (Studies in Asian Topics, Editors: David Arnold, Peter Robb), Routledge, ISBN 978-0700702848, Chapter 10;
K Ewing (1988), Sharia and ambiguity in South Asian Islam, University of California Press, ISBN 978-0520055759


More about Manu:

Hindu texts describe units of Kala measurements, from microseconds to Trillions of years. According to these texts, time is cyclic, which repeats itself forever.
Taken from https://archive.is/Mri30#selection-281.0-281.14, 
https://archive.is/6b9af#selection-69.0-73.49 good site Must watch. A Non-profit Service by Khapre Family since 1997. I am thankful to this family. 

ब्रह्मा का एक दिन बराबर है:
(14 गुणा 71 महायुग) + (15 x 4 चरण)
= 994 महायुग + (60 चरण)
= 994 महायुग + (6 x 10) चरण
= 994 महायुग + 6 महायुग
= 1,000 महायुग
एक मन्वन्तर में 71 महायुग (306,720,000 सौर वर्ष) होते हैं. प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं|
 हर एक मन्वन्तर का राजा मनु होता है, एवं उसकी सहायता के लिए सप्तर्षि, देवतागण,इन्द्र, अवतार एवं मनुपुत्र रहते हैं । इनमें सप्तर्षियों का कार्य प्रजा उत्पन्न करना रहता है, एवं इन प्रजाओं का पालन मनु एवं उसके पुत्र भूपाल बन कर करते हैं । इन भूपालों को देवतागण सलाह देने का कार्य करते है, एवं भूपालों को प्राप्त होनेवाली अडचनों का निवारण इन्द्र करता है । जिस समय इन्द्र हतबल होता है, उस समय स्वयं विष्णु अवतार लेकर भृपालोम का कष्ट निवारण करता है । मनु एवं उसके उपर्युक्त सारे सहायकगण विष्णु के अंशरुप माने गये है, तथा मन्वंन्तर के अन्त में वे सारे विष्णु में ही विलीन हो जाते हैं । किसी भी मन्वन्तर के आरम्भ में वे विष्णु के ही अंश से उत्पन्न होते हैं [विष्णु.१.३] । 
n.  मनवसृष्टि का प्रवर्तक आदिपुरुष, जो समस्त मानवजाति का पिता माना जाता है [ऋ.१.८०.१६,११४.२, २.३३.१३, ८.६३.१];[ अ. वे.१४.२.४१];[ तै. सं.२.१.५.६] । कई अभ्यासकों के अनुसार मनु वैवस्वत तथा यह दोनों एक ही व्यक्ति थे (https://en.wikipedia.org/wiki/Manu_(Hinduism)) । ऋग्वेद में प्रायः बीस बार मनु का निर्देश व्यक्तिवाचक नाम से किया गया है । वहॉं सर्वत इसे ‘आदिपुरुष’ एवं मानव जाति का पिता, तथा यज्ञ एवं तत्संबंधित विषयों का मार्गदर्शक माना गया है । मनु के द्वारा बताये गये मार्ग से ले जाने की प्रार्थना वेदों में प्राप्त है [ऋ.८.३०.१] । 
मानवजाति का पिता n.  ऋग्वेद में पांच बार इसे पिता एवं दो बार निश्चित रुप से ‘हमारे पिता’ कहा गया है [ऋ.२.३३] । तैत्तिरीय संहिता में मानवजाति को ‘मनु की प्रजा’ (मानव्यःप्रजाः) कहा गया है [तै. सं. १.५.१.३] । वैदिक साहित्य में मनु को विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं इसे ‘वैवस्वत’ पैतृक नाम दिया गया है [अ.वे.८.१०];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यास्क के अनुसार, विवस्वत् का अर्थ सूर्य होता है, इस प्रकार यह आदिपुरुष सूर्य का पुत्र था [नि.१२.१०] । यास्क इसे सामान्य व्यक्ति न मानकर दिव्यक्षेत्र का दिव्य प्राणी मानते है [नि.१२.३४] । वैदिक साहित्य में यम को भी विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं कई स्थानो पर उसे भी मरणशील मनुष्यों में प्रथम माना गया है । इससे प्रतीत होता है कि, वैदिक काल के प्रारम्भ में मनु एवं यम का अस्तित्व अभिन्न था, किन्तु उत्तरकालीन वैदिक साहित्य में मनु को जीवित मनुष्यों का एवं यम को दूसरे लोक में मृत मनुष्यों का आदिपुरुष माना गया । इसीलिए शतपथ ब्राह्मण में मनु वैवस्वत को मनुष्यों के शासक के रुप में, तथ यम वैवस्वत को मृत पितरों के शासक के रुप मे वर्णन किया गया है [ऋ.८.५२.१];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यह मनु सम्भवतः केवल आर्यो के ही पूर्वज के रुप में माना गया है, क्योंकि अनेक स्थलों पर इसका अनार्यो के पूर्वज द्यौः से विभेद किया है । 
यज्ञसंस्था का आरंभकर्ता n.  -मनु ही यज्ञप्रभा का आरंभकर्ता था, इसीसे इसे विश्व का प्रथम यज्ञकर्ता माना जाता है [ऋ.१०.६३.७];[ तै. सं.१.५.१.३,२.५.९.१,६.७.१,३.३.२.१,५.४.१०.५,६.६.६.१,७.५.१५.३] । ऋग्वेद के अनुसार, विश्व में अग्नि प्रज्वलित करने के बाद सात पुरोहितों के साथ इसने ही सर्वप्रथम देवों को हवि समर्पित की थी [ऋ.१०.६३] । 
यज्ञ से ऐश्वर्यप्राप्ति n.  तैत्तिरीय संहिता में मनु के द्वारा किये गये यज्ञ के उपरांत उसके ऐश्वर्य के प्राप्त होने की कथा प्राप्त है । देव-दैत्यों के बीच चल रहे युद्ध की विभीषिका से अपने धन की सुरक्षा करने के लिए देवों ने उसे अग्नि को दे दिया । बाद को अग्नि के हृदय में लोभ उत्पन्न हुआ, एवं वह देवों के समस्त धनसम्पत्ति को लेकर भागने लगा । देवों ने उसका पीछा किया, एवंउसे कष्ट देकर विवश किया कि, वह उनकी अमानत को वापस करे । देवों द्वारा मिले हुए कष्टों से पीडित होकर अग्नि रुदन करने लगा, इसी से उसे ‘रुद्र’ नाम प्राप्त हुआ । उस समय सुअके नेत्रों से जो आसूँ गिरे उसीसे चॉंदी निर्माण हुयी, इसी लिए चॉंदी दानकर्म में वर्जित है। अन्त में अग्नि ने देखा कि, देव अपनी धनसम्पत्ति को वापस लिए जा रहे हैं, तब उसने उनसे कुछ भाग देने की प्रार्थना की । तब देवों ने अग्नि को ‘पुनराधान’ (यज्ञकर्मों में स्थान) दिया ।आगे चलकर मनु, पूषन्, त्वष्टु एवं धतृ इत्यादि ने यज्ञकर्म कर के ऐश्वर्य प्राप्त किया [तै.सं.१.५.१] । मनु ने भी लोगों के प्रकाशहेतु अग्नि की स्थापना की थी [ऋ.१.३६] । मनु का यज्ञ वर्तमान यज्ञ का ही प्रारंभक है, क्यों कि, इसके बाद जो भी यज्ञ किये गये, उन में इसके द्वारा दिये गये विधानोम को ही आधार मान कर देवों को हवि समर्पित की गयी [ऋ.१.७६.] । इस प्रकार की तुलनाओं को अक्सर क्रियाविशेषण शब्द ‘मनुष्वत्’ (मनुओं की भॉंति) द्वारा व्यक्ति किया गया है। यज्ञकर्ता भी अग्नि को उसी प्रकार यज्ञ का साधन बनाते हैं, जिस प्रकार मनुओं ने बनाया था [ऋ.१.४४] वे मनुओं की ई भॉंति अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, तथा उसीकी भॉंति सोम अर्पित करते हैं [ऋ.७.२.४.३७] । सोम से उसी प्रकार प्रवाहित होने की स्तुति की गयी है, जैसे वह किसी समय मनु के लिए प्रवाहित होता था [ऋ.९.९६] । 
समकालीन ऋषि n.  मनु का अनेक प्राचीन यज्ञकर्ताओं के साथ उल्लेख मिलता है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैः---अंगिरस् और ययाति [ऋ.१.३१] । भृगु और अंगिरस [ऋ.८.४३], अथर्वन् और दध्यञ्च [ऋ.१.८०] । दध्यञ्च, अंगिरस्, अत्रि और कण्व [ऋ.१.१३९]। ऐसा कहा गया है कि, कुछ व्यक्तियों ने समय समय पर मनु को अग्नि प्रदान क्र उसे यज्ञ के लिए प्रतिष्ठित किया था, जिसके नाम इस प्रकार है---देव [ऋ.१.३६], मातरिश्वन, [ऋ.१.१२८] । मातरिश्वन् और देव [ऋ.१९.४६] ।, काव्य उश्सना [ऋ.८.२३] । ऋग्वेद के अनुसार, मनु विवस्वत ने इन्द्र के साथ बैठ कर सोमपान किया था [वाल.३] । तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण में मनु का अक्सर धार्मिक संस्कारादि करनेवाले के रुप में भी निर्देश किया गया है । 
मन्वंतरों का निर्माण n.  आदिपुरुष मनु के पश्चात्, पृथ्वी पर मनु नामक अनेक राजा निर्माण हुए, जिन्होने अपने नाम से नये-नये मन्वंतरो का निर्माण किया । ब्रह्मा के एक दिन तथा रात के कल्प कहते हैं । इनमें से ब्रह्मा के एक दिन के चौदह भाग माने गये हैं, जिनमें से हर एक को मन्वन्तर कहते हैं । पुराणों के अनुसार, इनमें से हर एक मन्वन्तर के काल में सृष्टि का नियंत्रण करनेवाला मनु अलग के काल में सृष्टि का नियंत्रण करनेवाला मनु अलग होता है, एवं उसीके नाम से उस मन्वन्तर का नामकारण किया गया है । इस प्रकार् जब तक वह मनु उस सृष्टि का अधिकारी रहता है, तब तक वह काल उसके नाम से विख्यात रहता है । 
चौदह मन्वंतर n.  इस तरह पुराणों में चौदह मन्वन्तर माने गये हैं, जो निम्नलिखित चौदह मनुओं के नाम से सुविख्यात हैः---१. स्वायंभुव,२.स्वारोचिष,३. उत्तम (औत्तम), ४. तामस, ५. रैवत,६. चाक्षुष, ७. वैवस्वत, ८. सावर्णि (अर्कसावर्णि) ९. दक्षसावर्णि, १०. ब्रह्मसावर्णि ११. धर्मसावर्णि १२. रुद्रसावर्णि, १३. रौच्य, १४. भौत्य । इनमें से स्वायंभुव से चाक्षुक्ष तक के मन्वन्तर हो चुके है, एवं वैवरवत मन्वंतर सांप्रत चालू है । बाकी मन्वंतर भविष्यकाल में होनेवाले हैं 
पाठभेद n.  चौदह मन्वन्तर के अधिपतियों मनु के नाम विभिन्न पुराणों में प्राप्त है । इनमें से स्वायंभुव से ले कर सावर्णि तक के पहले आठ मनु के नाम के बारे में सभी पुराणों मे प्रायः एकवाक्यता है, किंतु नौ से चौदह तक के मनु के नाभ के बारे में विभिन्न पाठभेद प्राप्त है, जो निम्नलिखित तालिका में दिये गये हैः--- 
वायु - सावर्ण
पद्म - रौच्य
मार्क - सूर्यसावर्णि
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - दक्षसावर्णि
मत्स्य - रौच्य
ब्रह्म - रैभ्य
विष्णु - दक्षसावर्णि

१०
वायु - सावर्ण
पद्म - भौत्य
मार्क - ब्रह्मसावर्णि
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - ब्रह्मसावर्णि
मत्स्य - मेरुसावर्णि
ब्रह्म - रौच्य
विष्णु - ब्रह्मसावर्णि

११
वायु - सावर्ण
पद्म - मेरुसावर्णि
मार्क - धर्मसावर्णि
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - धर्मसावर्णि
मत्स्य - ब्रह्मसावर्णि
ब्रह्म - मेरुसावर्णि
विष्णु - धर्मसावर्णि

१२
वायु - सावर्ण
पद्म - ऋभु
मार्क - रुद्रसावर्णि
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - रुद्रसावर्णि
मत्स्य - ऋतसावर्णि
ब्रह्म - - 
विष्णु - रुद्रसावर्णि

१३
वायु - रौच्य
पद्म - ऋतुधामन्
मार्क - रौच्य
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - देवसावर्णि
मत्स्य - ऋतधामन्
ब्रह्म - -
विष्णु - रौच्य

१४
वायु - भौत्य
पद्म - विष्वक्सेन 
मार्क - भौत्य 
ब्रह्यवैत्तरी एवं भागवत - इंद्रसावर्णि ( चंद्रसावर्णि )
मत्स्य - विश्वक्सेन
ब्रह्म - भौत्य
विष्णु - भौत्य 

The 14 Manus of the current aeon are::His Divine Grace A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada. Teachings of Lord Caitanya (Third Edition): The Golden Avatara. The Bhaktivedanta Book Trust. pp. 109\u2013.
ManvantaraName of Manu who is in charge:Lord Vishnu's Avatara:
1Svayambhuva ManuYajna
2Svarocisha ManuVibhu
3Uttama ManuSatyasena
4Tapasa ManuHari
5Raivata ManuVaikuntha
6Cakshusha ManuAjita
7Vaivasvata Manu (current)Vamana
8Savarni ManuSarvabhauma
9Daksha-savarni ManuRishabha
10Brahma-savarni ManuVishvaksena
11Dharma-savarni ManuDharmasetu
12Rudra-savarni ManuSudama
13Deva-savarni ManuYogesvara
14Indra-savarni ManuBrihadbhanu
स्वायंभुव मन्वन्तर  n.  
  1. मनु - स्वायंभुव ।
  2. सप्तर्षि---अंगिरस् (भृगु), अत्रि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, वसिष्ठ ।
  3. देवगण---याम या शुक्र के जित, अजित् व जिताजित् ये तीन भेद था । प्रत्येक गण में बारह देव थे [वायु.३१.३-९] । उन गणों में निम्न देव थे-ऋचीक, गृणान, विभु,विश्वदेव,श्रुति,सोमपायिन्, [ब्रह्मांड. २.१३] । इन देवों में तुषित नामक बारह देवों का एक और गण था [भा.४.१.८] ।
  4. इन्द्र---विश्वभुज् (भागवतं मतानुसार यज्ञ) । इन्द्राणी ‘दक्षिणा’ थी [भा.८.१.६] ।
  5. अवतार---यज्ञ तथा कपिल (विष्णु एवं भागवत मतानुसार) ।
  6. पुत्र---अग्निबाहु (अग्निमित्र, अतिबाहु), अग्नीध्र (आग्नीध्र), ज्योतिष्मत्, द्युतिमत्, उत्र (वयुष्मत्, सत्र, सह), मेधस् (मेध,मेध्य), मेधातिथि, वसु (बाहु), सवन (सवल), हव्य (भव्य) । मार्कडेय के अनुसार, इसके पुत्रों में से पहले सात भूपाल थे । भागवत तथा वायु के अनुसार, इसे प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो पुत्र थे । प्रियव्रत के दस पुत्र थे ।

स्वारोचिष मन्वंतर  n.  
  1. मनु --- स्वारोचिष । कई ग्रन्थों में इस मन्वन्तर के मनु का नाम ‘द्युतिमत्’ एवं ‘स्वारोचिस्’ बताया गया है । 
  2. सप्तर्षि---अर्ववीर (उर्वरीवान्, ऊर्ज,और्व), ऋषभ (कश्यप,काश्यप),दत्त (अत्रि), निश्च्यवन (निश्चर,ल),प्राण,बृहस्पति (अग्नि,आलि), स्तम्ब (ऊर्जस्तंब, ऊर्जस्वल) । ब्रह्मांड में स्वारोषित मन्वन्तर के कई ऋषियों के कुलनाम देकर उन्हें सप्तर्षियों का पूर्वज कहा गया है । 
  3. देवगण---तुषित, इडस्पति,इध्म,कवि,तोष,प्रतोष,भद्र,रोचन,विभु,शांति,सुदेव (स्वह्र), पारावत । 
  4. इन्द्र---विपश्चित् । भागवत के अनुसार, यज्ञपुत्र रोचन । 
  5. अवतार---तुषितपुत्र अजित (विभु) । 
  6. पुत्र---अयस्मय अपोमूर्ति (आपमूर्ति), ऊर्ज, किंपुरुष, कृतान्त, चैत्र,ज्योति (रोचिष्मत्,रवि), नभ,(नव,नभस्य),प्रतीत (प्रथित, प्रसृति, बृहदुक्थ), भानु, विभृत,श्रुत,सुकृति (सुषेण), सेतु, हविघ्न (हविघ्न), इसके पुत्रों के ऐसे कुछ नाम मिलते हैं, किन्तु उनमें से कुल नौ या दस की संख्या प्राप्त है । मत्स्य के अनुसार, इस मन्वन्तर में ऋषियों की सहायता के लिए वसिष्ठपुत्र सात प्रजापति बने थे । किन्तु उन सब के नाम मनु पुत्रों के नामों से मिलते हैं, जैसे-आप, ज्योति,मूर्ति,रय, सृकृत,स्मय तथा हस्तीन्द्र ।

उत्तम मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- उत्तम । 
  2. सप्तर्षि---अनघ,ऊर्ध्वबाहु,गात्र, रज, शुक्र (शुक्ल), सवन, सुतपस्। ये सब वसिष्ठपुत्र थे, एवं वासिष्ठ इनका सामान्य नाम था । पूर्वजन्म में ये सभी हिरण्यगर्भ के ऊर्ज नामक पुत्र थे । 
  3. देवगण---प्रतर्दन (भद्र.भानुं,भावन,मानव), वशवर्तिन् (वेदश्रुति), शिव, सत्य, सुधामन् । इन सबके बारह बारह के गण थे । 
  4. इन्द्र---सुशांति (सुकीर्ति,सत्यजित्) । 
  5. अवतार---सत्या का पुत्र सत्य,अथवा धर्म तथा सुनृता का पुत्र सत्यसेन । 
  6. पुत्र---अज,अप्रतिम,(इष,ईष), ऊर्ज,तनूज (तनूर्ज,तर्ज), दिव्य (दिव्यौषधि, देवांबुज), नभ (नय), नभस्य (पवन,परश्रु,परशुचि),,मधु,माधव,शुक्र, शुचि (शुति,सुकेतु) ।

तामस मन्वन्तर n.  
  1. मनु --- तामस । 
  2. सप्तर्षि---अकपि (अकपीवत्), अग्नि,कपि (कपीवत्), काव्य (कवि,चरक), चैत्र (जन्यु,जह्रु, जल्प), ज्योतिर्धर्मन् (ज्योतिर्धामन्, धनद), धातृ (धीमत्, पीवर),पृथु । 
  3. देवगण---वीर,वैधृति,सत्य (सत्यक,साध्य), सुधी, सुरुप,हरि । मार्कण्डेय के अनुसार, इनकी कुल संख्या सत्ताइस है । अन्य ग्रंथों में उल्लेख आता है किम, ये पुत्र एक एक न होकर सत्ताइस सत्ताइस देवों के गण थे । 
  4. इन्द्र---शिखि (त्रिशिख, शिबि) । 
  5. अवतार---हरि, जो हरिमेध तथा हरिणी का पुत्र था । इसे एक स्थान हर्या का पुत्र कहा गया है । 
  6. पुत्र---अकल्मष (अकल्माष), कृतबंधु,कृशाश्व, केतु,क्षांति,खाति (ख्याति)जानुजंघ,तन्वीन्,तपस्य, तपोद्युति (द्युति), तपोधन, तपोभागिन्, तपोमूल, तपोयोगिन्, तपोरति, दृढेषुधि, दान्त, धन्विन्, नर, परंतप, परीक्षित, पृथु,प्रस्थल,प्रियभृत, शयहय,शांत (शांति), शुभ, सनातन, सुतपस् । 
  7. योगवर्धन---कौकुरुण्डि, दाल्भ्य, प्रवहण, शङ्ग, शिव, सस्मित, सित । ये योगवर्धन केवल इसी मन्वंतर में मिलते हैं ।

रैवत मन्वन्तर n.  
  1.  मनु---रैवत । 
  2. सप्तर्षि---ऊर्ध्वबाहु (सोमप), देवबाहु (वेदबाहु), पर्जन्य,महामुनि (मुनि, वसिष्ठ,सत्यनेत्र), यदुध्र, वेदशिरस (वेदश्री, सप्ताश्रु, सुधामन्, सुबाहु,स्वधामन्), हिरण्यरोमन् (हिरण्यलोमन्) । 
  3. देवगण---आभूतरजस् (भूतनय, भूतरजय) । इसके रैभ्य तथा पारिप्लव (वारिप्लव) ये दो भेद हैं । इसके अतिरिक्त अमिताभ, प्रकृति, वैकुंठ, शुभा आदि देवगणों में प्रत्येक में १४ व्यक्ति हैं । 
  4. इन्द्र---विभु । 
  5. अवतार---विष्णु के अनुसार संभूतिपुत्र मानस, तथा भागवत के अनुसार शुभ्र तथा विकुंठा का पुत्र ‘वैकुंठ’। 
  6. पुत्र---अव्यय (हव्यप), अरण्य (आरण्य), अरुण, अर्जुन, कवि (कपि), कंबु, कृतिन्, तत्त्वदर्शिन्, धृतिकृत, धृतिमत्, निरामित्र, निरुत्सुक, निर्मोह, प्रकाश (प्रकाशक), बलबंधु, बाल, महावीर्य, युक्त, वित्तवत्, विंध्य, शुचि, शृंग, सत्यक, सत्यवाच, सुयष्टव्य (सुसंभाव्य), हरहन्।

चाक्षुष मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---चाक्षुष । 
  2. सप्तर्षि---अतिनामन्, उत्तम (उन्नत, भृगु), नभ (नाभ, मधु), विरजस् (वीरक), विवस्वत (हविष्मत्), सहिष्णुइ, सुधामन्, सुमेधस् । 
  3. देवगण---आद्य (आप्य), ऋभ, ऋभु, पृथग्भाव (प्रथुक-ग, यूथग), प्रसूत, भव्य (भाव्य,) वारि (वारिमूल), लेख । 
  4. इन्द्र---भवानुभव या मनोजव अथवा मंत्रद्रुम ।
  5. अवतार---विष्णु मतानुसार विकुंठापुत्र वैकुंठ, तथा भागवत मतानुसार वैराज तथा संभूति का पुत्र अजित् । 
  6. पुत्र---अग्निष्टुत, अतिरात्र, अभिमन्यु, ऊरु (रुरु) कृति, तपस्विन्, पुरु(पुरुष,पूरु), शतद्युम्न, सत्यवाच्‍, सुद्युम्न ।

वैवस्वत मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- वैवस्वत । 
  2. सप्तर्षि---अत्रि, कश्यप (काश्यप,वत्सर), गौतम (शरद्वत्), जमदग्नि, भरद्वाज (भारद्वज), वसिष्ठ (वसुमत), विश्वामित्र । 
  3. देवगण---आंगिरस (दस), अश्विनी (दो), आदित्य (बारह), भृगुदेव (दस), मरुत (उन्चास), रुद्र (ग्यारह), वसु (आठ), विश्वेदेव (दस), साध्य (बारह) । 
  4. इन्द्र---ऊर्जास्विन् या पुरंदर या महाबल । 
  5. अवतार---वामन । 
  6. पुत्र---अरिषट (दिष्ट,नाभागारिष्ट, नाभानेदिष्ट, रिष्ट, नेदिष्ट, उद्विष्ट), इक्ष्वाकु इल (सुद्युम्न),करुष, कृशनाभ धृष्ट (धृष्णु), नभ (नभग, नाभाग), नृग, पृशध्र, प्रांशु,वसुमत्, शर्याति ।

सावर्णि मन्वन्तर n.  
  1.  मनु --- सावर्णि ।
  2. सप्तर्षि---अश्वत्थामन्, (द्रोणि), और्व (काश्यप, रुरु, श्रुंग), कृप (शरद्वत, शारद्वत्), गालव (कौशिक), दीप्तिमत्, राम (परशुराम जामदग्न्य), व्यास (शतानंद, पाराशर्य) । 
  3. देवगण---अमिताभ (अमृतप्रभ), मुख्य (सुख,विरज), सुतप (सुतपस्, तप) । 
  4. इन्द्र---बलि (वैरोचन) । बलि वैरोचन की आसक्ति इन्द्रपद पर नहीं रहती है । अतएव कालान्तर में इन्द्रपद छोडकर वह सिद्धगति को प्राप्त करेगा । 
  5. अवतार---देवगुह्य तथा सरस्वती का पुत्र सार्वभौम अवतार होगा, तथा बलि के बाद वह सब व्यवस्था देखेगा । 
  6. पुत्र---अधृष्ट (अधृष्णु), अध्वरीवत् (अवरीयस्, अर्ववीर, उर्वरीयस्, (वीरवत), अपि, अरिष्ट (चरिष्णु,विष्णु), आज्य, ईडय, कृति, (धृति, धृतिमत्), निर्मोह, यवसस्, वसु, वरीयस्, वाच् (वाजवाजिन्, विरज,विरजस्क), वैरिशमन, शुक्र, सत्यवाच्, सुमति ।

दक्षसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- दक्षसावर्णि । 
  2. सप्तर्षि---ज्योतिष्मत्, द्युतिमत, मेधातिथि (मेधामृति, माधातिथि), वसु, सत्य (सुतपास, पौलह), सबल (सवन, वसित, वसिन), हव्यवाहन (हव्य, भव्य) । 
  3. देव---दक्षपुत्र हरित के पुत्र निर्मोह, पार (पर,संभूत), मरिचिगर्भ, सुधर्म, सुधर्मन, सुशर्माण । इनमें से हर एक के साथ बारह व्यक्ति हैं । 
  4. इन्द्र---कार्तिकेय ही आगे चलकर अद्‌भुत नाम से इन्द्र होगा । 
  5. अवतार---आयुष्मत् एवं अंबुधारा का पुत्र ऋषभ अवतार होगा । 
  6. पुत्र---अनीक (ऋ.चीक, अर्चिष्मत्, नाक), खड्‌गहस्त (पंचहस्त, पंचहोत्र, शापहस्त), गय, दीप्तिकेतु (दासकेतु, बर्हकेतु), धृष्टकेतु (धृतिकेतु, भूतकेतु), निराकृति (निरामय), पुथुश्रवस् (पृथश्रवस्), बृहत (बृहद्रथ, बृहद्यश,) भूरिद्युम्न ।

ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु --- ब्रह्मसावर्णि । 
  2. सप्तर्षि---आपांमूर्ति (आपोमूर्ति), अप्रतिम (अप्रतिमौजस, प्रतिम,प्रामति), अभिमन्यु (नभस, सप्तकेतु), अष्टम (वसिष्ठ, वशिष्ठ, सत्य,सद्य), नभोग (नाभाग),सुकृति (सुकीर्ति), हविष्मति । 
  3. देव---अर्चि सुखामन, सुखासीन, सुधाम, सुधामान, सुवासन, धूम,निरुद्ध, विरुद्ध । 
  4. इन्द्र---शान्ति नामक इन्द्र होगा । 
  5. अवतार---विश्वसृष्टय के गृह में विषूचि के गर्भ से विष्वक्सेन नाम्क अवतार होगा । 
  6. पुत्र---अनमित्र निरामित्र, उत्तमौजस, जयद्रथ, निकुषंश, भूरिद्युम्न, भूरिषेण, भूरिसेन, वीरवत् (वीर्यवत्), वृषभ, बृषसेन,शतानीक, सुक्षेत्र, सुपर्वन, सुवर्चस, हरिषेण।

धर्मसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---धर्मसावर्णि । 
  2. सप्तर्षि---अग्नितेजस्, अनघ (तनय, नग, भग), अरुण (आरुणि, तरुण, वारुणि), उदधिष्णन् (उरुधिष्ण्य, पुष्टि, विष्टि, विष्णु), निश्चर, वपुष्मत्, (ऋ.ष्टि), हविष्मत् ।
  3. देव---तीस कामग (काम-गम, कामज), तीस निर्माणरत (निर्वाणरति, निर्वाणरुचि), तीस मनोजव (विहंगम) । 
  4. इन्द्र---वृष (वृषन्, वैधृत) इन्द्र होगा । 
  5. अवतार---इस मन्वन्तर के अवतार का नाम धर्मसेतु है, जो धर्म (आर्यक) एवं वैधृति के पुत्र के रुम में जन्म लेनेवाला है । 
  6. पुत्र---आदर्श, क्षेमधन्वन् (क्षेमधर्मन्, हेमधन्वन्), गृहेषु (दृढायु), देवानीक, पुरुद्वह (पुरोवह) पौण्ड्रक (पंडक), मत (मनु, मरु), संवर्तक (सर्वग, सर्वत्रग, सर्ववेग, सत्यधर्म), सर्वधर्मन (सुधर्मन्, सुशर्मन्) ।

रुद्रसावर्णि मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---रुद्रसावर्णि । 
  2. सप्तर्षि---तपस्विन, तपोधन, (तपोनिधि, तमोशन, तपोधृति, तपोमति), तपोमूर्ति, तपोरति (तपोरवि), द्युति (अग्निध्रक, कृति), सुतपस्। 
  3. देव---रोहित (लोहित), सुकर्मन् (सुवर्ण), सुतार (तार,सुधर्मन्,सुपार), सुमनस्। 
  4. इन्द्र---ऋतधामन् नामक इन्द्र होनेवाला है । ५. अवतार---सत्यसहस् तथा सूनृता का पुत्र स्वधामन् अवतार होगा ।६. पुत्र---उपदेव (अहूर), देववत् (देववायू,) देवश्रेष्ठ, मित्रकृत (अमित्रहा, मित्रहा), मित्रदेव (चित्रसेन, मित्रबिंदु, मित्रविंद,) मित्रबाहु, मित्रवत्, विदूरथ, सुवर्चस्।

रौच्य मन्वन्तर  n.  
  1. मनु---रौच्य । 
  2. सप्तर्षि---अव्यव (पथ्यवत्, हव्याप) तत्वदर्शिन्, द्युतिमत्, निरुत्सुक, निर्मोक, निष्कंप, निष्प्रकंप, सुतपस् । 
  3. देव---सुकर्मन्. सुत्रामन (सुशर्मन), सुधर्मन् । प्रत्येक देवगण तीस देवों का होगा । 
  4. इन्द्र---दिवस्पति (दिवस्वामिन्) । 
  5. अवतार---देवहोत्र तथा बृहती का पुत्र अवतार होगा ।
  6. पुत्र---अनेक क्षत्रबद्ध (क्षत्रविद्ध, क्षत्रविद्धि, क्षत्रवृद्धि), चित्रसेन, तप (नय, नियति), धर्मधृत, (धर्मभृत, सुव्रत), धृत (भव), निर्भय, पृथ (दृध), विचित्र, सुतपस् (सुरस), सुनेत्र ।

भौत्य मन्वन्तर n.  
  1. मनु---भौत्य । 
  2. सप्तर्षि---अग्निबाहु (अतिबाहु), अग्निध्र (आग्नीध्र), अजित, भार्गव (मागध, माधव, श्वाजित), मुत (युक्त), शुक्र, शुचि । 
  3. देव---कनिष्ठ, चाक्षुष, पवित्र, भाजित (भाजिर, भ्राजिर), वाचावृद्ध (धारावृक) । प्रत्येक के साथ पॉंच पॉंच देव होगे । 
  4. इन्द्र---शुचि ही इस समय इन्द्र होगा । 
  5. अवतार---सत्रायण एवं विताना का पुत्र बृहद्भानु अवतार होगा । 
  6. पुत्र---अभिमानिन् (श्रीमानिन्), उग्र (ऊरु, अनुग्रह), कृतिन् (जिष्णु, विष्णु), गभीर (तरंगभीरु), गुरु, तरस्वान् (बुद्ध, बुद्धि,ब्रध्न), तेजस्विन्, (ऊर्जस्विन्, ओजस्विन्), प्रतीर (प्रवीण), शुचि, शुद्ध, सबल, सुबल) ।


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